We WantTo Finish Gang&Mafia Of Bollywood Who Kills #NewTalents #WeWantCBIEnquiry4SSR

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उसने ज़िंदगी से हार मानी और तुम चीख रहे हो कि वो “फेल हो गया”!

शायद उसकी ज़िंदगी बदरंग हो गई थी पर तुम्हें इससे क्या, तुम उसके फंदे का रंग बता रहे हो,

तुमने तो बिना जांचपड़ताल किए ही आत्महत्या का नाम दे दिया,जबकि हम सभी ने देखा कि किस तरह महारष्ट्र पुलिस ने हरकत की है,body की कोई hanging फ़ोटो क्यों नही ली गई,उस जगह पर कैसे सबको पुलिस आने-जाने दे रही थी,क्या ये गलत नही था? बिना डॉक्टर को दिखाए खुद से मृत मान लिया गया,बगल के हॉस्पिटल में क्यों नही ले जाया गया #कूपरहॉस्पिटल जो वहाँ से सबसे ज्यादा दूर था वहीं क्यों ले जाया गया,नौकर घूम-घूम के पन्नी में कुछ डाले जा रहा,उनकी बहन,दोस्त संदीप सिंह सबको कैसे पुलिस ने उस रूम में रहने दिया ये Against of Law है, 2 एम्बुलेंस आने का क्या मतलब,मीडिया इसपर कवरेज क्यों नही की,

ये सब कम नहीं था कि तुम उसके घर में घुस गए, दुख की घड़ी में परिवार से सवाल करने लगे, उन्हें मजबूर करने लगे कि वो कैमरे पर कुछ बोल दें।

सुशांत सिंह राजपूत की दुखद मौत के बाद भारतीय मीडिया ने जिस प्रकार से घटना की कवरेज की वो दर्शाता है कि उसका स्तर कितना नीचा हो गया है। भारत की मीडिया को थोड़ी सी तो संवेदना दिखानी चाहिए थी!

इस घटना को अभी 48 घंटे भी नहीं हुए थे कि बरेली के एक युवक ने भी वही रास्ता चुना, जिस रास्ते पर उसका हीरो, उसका रोल-मॉडल चला था। उसने भी अपनी जान दे दी। क्या उसकी जान नहीं जाती अगर सुशांत की आत्महत्या की रिपोर्टिंग में संवेदना ज्यादा और सनसनी कम होती?

एक ऐसे समय में कि जब हमारा देश और पूरी दुनिया एक महामारी से जूझ रही है, कई लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा है। ऐसे समय में आत्महत्या की खबरों को सनसनीखेज रूप देना घातक हो सकता है और कइयों को अनचाहे कदम उठाने की राह पर धकेल सकता है। खासकर तब जब आत्महत्या की खबर किसी स्टार की हो या लोगों के रोल-मॉडल की हो।ना केवल इससे दर्शकों पर गहरा असर पड़ता है बल्कि परिवार की तकलीफ को भी और बढ़ाता है। आप ही सोचिए कि दुख की घड़ी में आपके मुंह पर माइक लगाया जाए तो कैसे लगेगा? कई बार तो ये दु्ख और तकलीफ़ इतनी ज़्यादा हो जाती है कि  परिवार के लोगों में भी आत्महत्या के विचार आने लगते हैं।

आत्महत्या के इन सारे पहलुओं को देखते हुए कई देश जैसे कि अमेरिका, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इत्यादि ने दर्शकों की सुरक्षा के लिए आत्महत्या की रिपोर्टिंग पर अपनी मीडिया को कड़े निर्देश जारी किए हैं। वहां की मीडिया आत्महत्या की रिपोर्टिंग के दौरान या तो WHO की गाइडलाइन या स्वयं उस देश की गाइडलाइन का पालन करती है।

दुर्भाग्य से भारतीय मीडिया इसमें बहुत-बहुत पीछे है। मेरी पेटीशन साइन और शेयर करें।

आत्महत्या कि रिपोर्टिंग में कहीं तो एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए, जिसे पार नहीं किया जाए। इसीलिए मैं News Broadcasting Standards Authority of India से अपील करती हूँ कि वो “आत्महत्या की ज़िम्मेदाराना रिपोर्टिंग” की एक गाइडलाइन जारी करें, अपने कोड ऑफ एथिक्स में इसको शामिल करें और इसके उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई करें।

मेरी पेटीशन साइन करें और जितना हो सके शेयर करें ताकि भारत की मीडिया एक सकारात्मक कदम बढ़ाए, संवेदनशील घटनाएं जैसे कि आत्महत्या पर संवेदना और ज़िम्मेदारी के साथ रिपोर्टिंग करे।