Akhir Kab Tak

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100 साइन के बाद इस पेटीशन को लोकप्रिय पेटीशनों में फीचर किए जाने की संभावना बढ़ सकेगी!

M K Singh ने Ministry of Law, Justice and Legal Affairs, Govt of India, Dr Subrahmaniam Swamy को संबोधित करके ये पेटीशन शुरू किया

आखिर कब तक ?


हिन्‍दुस्‍तान की आजादी के 68 वर्षों बाद भी भारतीय कानून व्‍यवस्‍था और न्‍याय व्‍यवस्‍था में नितांत आवश्‍यक सुधार की पहल करने का साहस आज तक किसी सरकार, राजनेता, विधि विशेषज्ञ या बुद्धिजीवी ने नहीं किया और अगर कतिपय किसी ने पहल करने भर की भी कोशिश की तो हमारी तानाशाही प्रवृति की होती जा रही न्‍यायपालिका इस पहल को अपने अधिकार क्षेत्र/संरक्षित क्षेत्र में अतिक्रमण का अपराध चलाकर उस व्‍यक्ति को न्‍यायपालिका की अवमानना जैसे संगीन आरोपों की जटिल कानूनी प्रक्रिया के पेंच में फँसाकर उस व्‍यक्ति को इस तरह की पहलकदमी से आजीवन दूर रहने का सबक दे डालता है । भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था में न्‍यायपालिका यह सब लोक हित के लिए नहीं, अपितु अपने वर्चस्‍व को अनंत काल तक संरक्षित बनाए रखे जाने के पारंपरिक न्‍यायिक दायित्‍व निर्वहन के एक निरंतर प्रयास के क्रम का मर्म है ।

    एक सामान्‍य भारतीय नागरिक को भारतीय संविधान, न्‍यायपालिका व अन्‍य संवै‍धानिक संस्‍थाओं का आदर करना परम् कर्त्‍तव्‍य है । किन्‍तु किसी संस्‍था, सरकार या व्‍यक्ति के लिए धौंस या आदर दोनों भावनाऍं एक साथ प्रकट नहीं की जा सकती । गर्व व गरूर अपने सुकृतों के लिए हो तो वह लोक-कल्‍याणकारी है किन्‍तु गर्व व गरूर महज किसी संस्‍था, सरकार या व्‍यक्ति की सर्वोच्‍चता को स्‍थापित व साबित करने मात्र से हो तो वह विध्‍वंसकारी/कष्‍टकारी हो जाता है । भारतीय न्‍यायपालिका की आज यही स्थिति है । वह अपना सारा ध्‍यान, उर्जा व संविधान द्वारा प्रदत्‍त विशेषाधिकारों का प्रयोग अपने सर्व शक्तिमान स्‍वरूप के अस्तित्‍व को मिल रही यदा-कदा चुनौतियों को निष्क्रिय व कुंद करने में लगा देता है ।

    अधिकांश कार्यरत न्‍यायाधीशों के विभिन्‍न न्‍यायालयों के भिन्‍न-भिन्‍न न्‍यायिक आदेशों/निर्णयों का अध्‍ययन करने से पता चलता है कि अधिकांशत: न्‍यायाधीश विवेकपूर्ण, न्‍यायसंगत आदेश या निर्णय न देकर सिर्फ न्‍यायिक परंपरा का निर्वहन करते पाये जाते हैं । ये न्‍यायाधीश जिम्‍मेदारी को ताक पर रखकर अपने आप को एक ऐसी सुरक्षित स्थिति व मुद्रा में सदैव बने रहने की प्रणाली के तहत अपने दायित्‍वों का निर्वहन करना बेहतर मानते हैं । ताकि उनकी पदोन्‍नति या पदस्‍थापन में कोई अवरोध न आए और अकर्मण्‍य होते हुए भी समाज, सरकार व विधायिका की नजर में निष्‍पक्ष और ईमानदार हों चाहे न हों पर इसका प्रदर्शन जरूर हो ।  उदाहरणस्‍वरूप पटियाला हाऊस कोर्ट व अन्‍य अदालतों में कार्यरत न्‍यायाधीशों द्वारा देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों की कंपनियों की गाडि़यों की मुफ्त व नियमित सेवा का आनन्‍द लेने के कृत्‍य को कतई नैतिक व न्‍यायपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता है ।

     महाशय, तीव्र मीडिया के इस आधुनिक यु्ग में भी आज किसी में इतना साहस नहीं कि वह इस अव्‍यवस्‍था की खिलाफत कर सके । हास्‍य व क्षोभ तो तब होता है जब हमारे देश में अपराधी भी सजा मिलने के बाद वह निर्णय का सम्‍मान व न्‍यायालयों पर विश्‍वास की बात कहता हुआ पाया जाता है वहीं दूसरी ओर निर्दोष व्‍यक्ति अदालतों के प्रति आदर, सम्‍मान व विश्‍वास का भाव रखते हुए भी लंबी कानूनी प्रक्रिया व न्‍यायिक व्‍यवस्‍था में उलझकर अप्रत्‍यक्ष रूप में दण्‍ड पाता रहता है ।

    कहने का मतलब साफ है कि जो डरता है वह आदर या सम्‍मान नहीं करता किन्‍तु जो आदर करता है उसे डरने की कोई अवश्‍यकता ही नहीं पड़ती । समाज में अब न्‍यायालयों के प्रति आदर व सम्‍मान नहीं अपितु सिर्फ डर का भाव रह गया है जो दीर्घ काल तक नहीं रह सकता । न्‍यायालयों को चाहिए कि वह समाज के विश्‍वास को पुन: अविलंब प्राप्‍त करने का प्रयास करे ।

    भारतीय न्‍यायव्‍यवस्‍था का सिद्धान्‍त है कि भले ही सौ अपराधी बच जाऍं किन्‍तु किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए । परन्‍तु वास्‍तविकता क्‍या है यह किसी से छिपा नहीं है । क्‍या आज के न्‍यायिक व्‍यवस्‍था में यह चरितार्थ होता है । न्‍यायपालिका खुद इसका जवाब ढ़ॅूंढ़ ले और यदि उपयुक्‍त जवाब न मिले तो भी दलील देकर अपनी पीठ थपथपा ले, क्‍योंकि उनकी शान में तो कोई भी भारतीय बोल सकता है किन्‍तु उनकी आलोचना करने का अधिकार किसी भारतीय को नहीं है बजाय खुद न्‍यायपालिका के जो खुद उस आलोचना का एक हिस्‍सा होता है । और यही वजह है कि वह सर्वशक्तिमान है । अब तो उसने संसद जैसे पवित्र और सर्वोच्‍च संस्‍था के प्रति भी चुनौति देना शुरू कर दिया है ।

    निर्दोषों को अदालती प्रताड़ना व किसी-किसी मामले में सजा, वहीं दोषियों के बचकर निकल जाने के पीछे गवाहों का अभाव, कानूनी प्रावधान, प्रमाणिक या अप्रमाणिक साक्ष्‍यों का अभाव या प्रभाव का होना बताया जाता है । जिसकी समुचित जानकारी कानूनी विद्वान के रूप में वकीलों के पास होती है । इन वकीलों की सेवा उनके द्वारा तय की गयी राशि (शुल्‍क) की अदायगी के बाद ही संभव होता है । तो क्‍या इसका मतलब यह नहीं कि अगर किसी असहाय निर्दोष को वह शुल्‍क अदा करने की क्षमता न हो तो वह उस विशिष्‍ट कानूनी ज्ञान रखने वाले अधिवक्‍ता के कानूनी ज्ञान का लाभ व न्‍याय दोनों से वंचित रह जाएगा । यही न्‍यायपालिका का सबसे बड़ा व मूलभूत अन्‍याय है जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जा रहा है । चाहे वह उच्‍चतम न्‍यायालय हो या निचली अदालत सब जगह यह कानूनी सलाह, दॉंव-पेंच व कानूनी उपचार रूपी बाजार सशक्‍त और संगठित रूप में और एक चिर-प्रतिष्ठित रूप में वर्षों से बेरोक-टोक फल-फूल रहा है । इन बाजारों के दुकानदारों के प्रभाव व पैठ विधायिका व न्‍यायालय के उच्‍च गलियारे से लेकर राजनेताओं के रूप में गलियों तक में होने का प्रमाण मिलता है । क्‍या सरकार, समाज, संसद या खुद न्‍यायपालिका या विधायिका वर्षों से चल रहे न्‍याय के इस खरीद-फरोख्‍त के अवैध बाजार को एक कानून के द्वारा ध्‍वस्‍त नहीं कर सकता । जिसमें यह प्रणाली बनाई जाए कि कानूनी उपचार के लिए आम आदमी को एक सुनियोजित तरीके से निबंधित वकीलों में से ही किसी एक को कंप्‍यूटर प्रणाली द्वारा अनुबंधित कराया जाए । इनके शुल्‍क की अदायगी एक ग्रेडिंग सिस्‍टम के तहत तय की जाए और इन पर इस तरह की पाबंदी हो कि कोई भी वकील सीधे किसी भी व्‍य‍क्ति से अपने आप को अनुबंध कराये जाने की सिफारिश न कर पाये । शुल्‍क व वकीलों के नाम कम्‍प्‍यूटराईज्‍ड तरीके से ग्रेडिंग आधार पर तय हो । भारत की एक सर्वोच्‍च संस्‍था में इस तरह दुकान चलाने वालों के प्रति सख्‍त होना ही होगा तभी न्‍यायिक व्‍यवस्‍था में सुधार संभव होगा । किसी भी सरकारी संस्‍था में इस तरह से निजी दुकान चलाना कतई संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है । इसे रोकना हम सब का परम कर्तव्‍य है ।

 

 

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