Revoke Model Act or Remodify ( मॉडल एक्ट हटाओ या आवश्यक सुधार करो )

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म.प्र. सरकार द्वारा लाये गए मंडी मॉडल एक्ट के विरोध के सम्बंध में

जैसा की आप सबको विदित है की म.प्र. सरकार ने दिनांक 1 मई 2020 को अध्यादेश क्रमांक 160 जारी कर मध्यप्रदेश कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 में संशोधन कर मॉडल एक्ट लागू कर दिया है । जिससे स्पष्ट है की राज्य सरकार ने न केवल मंडी कृत्यकारियो ( व्यापारी, कर्मचारी, हम्माल-तुलावटी ) बल्कि किसानों की भी मंशा के विपरीत फैसले मंडी मॉडल एक्ट में लागू किये गए है । इसे लागू होने के साथ लगभग मंडी क्षेत्र से जुड़े सभी वर्गो के हित दुष्प्रभावित होंगे ।

1. किसानों के साथ ठगी -

मॉडल कहा गया है कि एक सरकारी मंडी के नियंत्रण से बाहर प्राइवेट कंपनियों को अनाज खरीदने की अनुमति मिलेगी। इसी परिपेक्ष में इसका असर ये होगा की सरकारी मंडियों में अगर 2000 रुपए प्रति क्विंटल गेहूं बिकेगा तो प्राइवेट कंपनियां 2300 रुपए क्विंटल खरीदने का ऑफर किसानों को देंगी, परंतु अनाज के बदले पैसा भुगतान न कर सामग्री खरीदने के लिए किसानों को मजबूर करेंगे। जैसे किराना वस्तुएं खाद, बीज, इलेक्ट्रॉनिक सामान इत्यादि फिर 2300 रुपए की अनाज के बदले 1500 रुपए की सामग्री पर 2300 रुपए कीमत छाप कर किसान को विक्रय करेंगे। इस प्रकार से अधिक कीमत का लालच देकर किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से लूट जाएगा।

2. हम्माल तुलावटियों एवं संबंधित मजदुरो की आजीविका पर संकट -

प्राइवेट कंपनियां लोकलुभावन ऑफर के कारण सरकारी मंडियों में न तो अनाज की आवक होगी और न ही व्यापार होगा। इससे प्रदेश भर में लाखों की संख्या में मध्यमवर्गीय व्यापारी हम्माल, तुलावटी बेरोजगार हो जाएंगे।

3. मंडी कर्मचारियों के वेतन भत्तो पर संकट -

सरकारी मंडियों में व्यापार खत्म होने से मंडी फीस से होने वाली आय भी खत्म होगी। इससे सरकारी मंडियों में कार्यरत लगभग 10 हजार कर्मचारी व लगभग 3000 पेंशनर्स व उनके परिवार के लगभग 50 हजार सदस्यों के सामने भूखे मरने की स्थिति निर्मित होगी।

4. पूर्ववत स्थापित सरकारी तंत्र की समाप्ति -

मप्र कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 के लागू होने से पहले मंडियों में आढ़त प्रथा चालू थी जिसमें आढ़तियों प्राइवेट मंडी किसानों से 5% और क्रेता व्यापारियों से 5% कुल 10%आड़त शुल्क वसूला जाता था। जिससे किसानों का शोषण होता था इससे किसानों के शोषण को रोकने के लिए शासन द्वारा सरकारी मंडियां बनाई गई थी। मंडी एक्ट में नए संशोधन से पुरानी आदत कुप्रथा फिर से जीवित हो जाएगी। यदि नवीन संशोधन लागू होता है तो सरकारी मंडियां धीरे-धीरे खत्म होती जाएंगी और प्राइवेट मंडियां खड़ी होती चली जाएंगी।

इस अध्यादेश के सम्बन्ध में कुछ जरूरी सुझाव

इस अध्यादेश के लागू होने के उपरांत निर्मित होने वाली परिस्थितियों को रोकने सुझावों में -

1. मप्र कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 में संशोधन संबंधी शासन का अध्यादेश 01 मई 2020 को निरस्त किया जाए अथवा मंडी अधिनियम 1972 के पूर्व प्रावधानों के तहत प्राइवेट मंडी इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म ट्रेडिंग कंपनी को सरकारी मंडी समितियों की पूर्णता नियंत्रण में रखा जाए।

2. किसी भी प्राइवेट मंडी या निजी क्रय केंद्रों में किसानों की उपज की आवक व विक्रय से लेकर पूर्ण भुगतान होने तक का कार्य सिर्फ शासकीय मंडी कर्मचारियों के प्रत्यक्ष निगरानी में ही संपादित करने का प्रावधान हो।

3. मंडी समिति सेवा मंडी बोर्ड सेवा और राजमंडी वोट सेवा इन तीनों सेवाओं को एकीकृत कर सिर्फ राजमंडी सेवा किया जाकर मप्र शासन के कर्मचारी घोषित किया जाए।

4. मंडी फीस से होने वाली सभी आय मप्र शासन के कोषालय में जमा कराया जाए। जिससे विपणन संबंधी कार्य का नियंत्रण व संचालन प्रभावी ढंग से संपादित हो सकेंगे।

इस बात तो अधिक से अधिक मात्रा में राज्य सरकार तक पहुँचाने के उद्देश्य से ये याचिका बनाई गई है । इसे ज्यादा से ज्यादा हस्ताक्षर कर राज्य सरकार को इस काले कानून (जो किसी भी वर्ग के लिए हितकारी नही है) को निरस्त करने हेतु अपना समर्थन दे ।

यदि अध्यादेश निरस्त नहीं किया गया तो मॉडल एक्ट के विरोध में कर्मचारी व्यापारी किसान हड़ताल करने के साथ-साथ सड़कों पर उतरने को मजूबर होंगे।

साभार
मंडी कर्मचारी परिवार
मप्र राज्य कृषि विपणन बोर्ड मप्र