Indian Education policy - expectation

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आदरणीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार 
आदरणीय प्रधान मंत्री, भारत सरकार 


श्रीमान निशंक,  श्री मान मोदी 


मुझे यह लगा था कि यह शिक्षा नीति भारत के उन निराश नागरिको के लिए लिखी गई होगी जिनके चिंता का हल इसमें होगा, और जिससे वे अपने और अपने भावी पीढ़ी के बौद्धिक विकास की रूप रेखा को जान सकें. क्या यह संभव है कि आप इस नीति को भारतीय जनता के अपेक्षा अनुसार और बोधगम्य बना सकें? 


नीति शब्द न्या + इति का युग्म है. अर्थात जहां तर्क वितर्क की समाप्ति हो जाय. यह वह फैसला या निश्चय है जिस पर सभी सहमत होंगे और जिसका कोई और विकल्प नहीं होगा. अंग्रेजी भाषा में नीति को पॉलिसी कहते हैं, पॉलिसी का अर्थ है पोल या लट्ठ जिसे सीमा पर गाड़ कर या नियम बना कर, अपना अधिकार जताया जाता है. 


किसकी नीति? यह नीति जिसके बारे में है उस शिक्षा की कोई न कोई परिभाषा होनी ही चाहिए. भला कोई यह कैसे जानेगा कि वह व्यक्ति शिक्षित है या नहीं? रोगी को पहिचान लेना सरल इसलिए है क्योंकि  रोग के लक्षण पहिले से ही परिभाषित हैं. इसी तरह, शिक्षा की जैसी भी परिभाषा होगी उसी अनुसार शिक्षित व्यक्ति को देखा और परखा जा सकता है. नहीं तो  लोग किसी न किसी प्रमाणपत्र के बिना शिक्षित कहला ही नहीं सकते. किसी का शिक्षित होना फिर, उन प्रमाणपत्र देने वालों का एकाधिकार हो जायगा, और यह शिक्षा का व्यवसाय देश के नागरिकों के लिये नयी गुलामी का श्रोत होगी. 


मेरा मत है कि जिसे हम शिक्षा कहते हैं उस की भारत में, कोई न कोई, सर्व मान्य परिभाषा निश्चित होनी ही चाहिये. शिक्षा एक तरह से साक्षात्कार की विधि है. अर्थात जो दिख नहीं रहा है उसे देखने की दृष्टि मिलना ही शिक्षा है. पानी के सूक्ष्म जीव, पारस्परिक संबंध, रोग के लक्षण, विद्युत तरंगें, और प्रकृति के नियम कभी दिखते नहीं किन्तु ज्ञान होने के कारण हम उनसे परिचित हो जाते हैं. जिस ज्ञान का लाभ हम को मिलता है और उसके बांटने से वह बढ़ता जा रहा है. 


संकेतों और शब्दों की रचना और उनके द्वारा, विचारों से परिचित  या परिभाषित होने के बाद ही हमारा परस्पर संवाद संभव हो पाता है. उसके बाद, निरंतर, जटिल विचारों की संरचना से बने मन द्वारा, संसार जिसे भवसागर या सम्भावनाओं के समुद्र भी कहते हैं, जीवन यात्रा सुगम होती है. 


शिक्षा के लिये हम, बाल्यकाल से ही दूसरे पर निर्भर रहते हैं. संसार के अलग अलग क्षेत्र में, विचारों के जटिल मार्ग पर सुरक्षित ले जाने वाले साहसिक शिक्षक, हमें कृतार्थ करते हैं. शिक्षा वह माध्यम है जिससे संसार का संचित ज्ञान, शिक्षक या पुस्तकों के द्वारा अगले पीढी तक पहुंचता है. यह एक उद्योग भी जिसके द्वारा ज्ञान की पवित्रता और उपयोगिता संरक्षित रहती है, और यही व्यवस्था समाज और देश के विकास में योगदान करती है. शिक्षक का अपने शिष्य से प्रेम और अपनापन, जितना होगा शिक्षा उतनी अधिक सरल और बोधगम्य होगी. 


याद रहे कि, शिक्षा का यह उद्योग जितना लाभदायक है उतनी ही हानिकारक भी है. जैसे कुएं में भंग पड़ गई हो उसी तरह, गलत या दोष पूर्ण शिक्षा से उस पर निर्भर सभी लोग बीमार या मनोरोगी बन सकते हैं. शिक्षा के कारण उनके बुद्धि का विकास रुक जाता है, और वे सदा के लिए अपंग बन जाते हैं. उनका आत्मबल नष्ट हो जाता है, और वे चरित्र से भी पतित हो जाते हैं. शिक्षा की फैक्ट्री से निकले जीव जिनके मन में सूचना की चिप फिट कर दी गयी है, और हर एक की परीक्षा ले, डिग्री या प्रमाण पत्र दे कर, उनको बाजार में बिकने के लिए तैयार किया जाता है, यह कितना उचित है, चिंतनीय है.  शिक्षा की इस फैक्ट्री में से जो अवांछित या अनुपयोगी उत्पाद निकलते हैं उनका जिम्मेदार कौन होगा? 


शिक्षा की यह दिशा जो उद्यमों की तरह चलती है बदलनी होगी. शिक्षा चाहने या लेने वाले क्या चाहते हैं पहिले वह जान लेना आवश्यक है. शिक्षा देने वाले उसके बाद अपने कर्तव्य को निश्चित करेंगे. सबसे पहिले, शिक्षित जीवों के मौलिक गुण या लक्षण की खोज की बहुत आवश्यकता है और, शिक्षा नीति यह तय करे कि शिक्षा की वह परिभाषा क्या होनी चाहिए. उसके बाद, शिक्षा की उस विधि का अविष्कार होगा जिसके द्वारा वे गुण या लक्षण, शिक्षा प्रदाता द्वारा उन जीव में डाले जा सकें और, जिससे शिक्षा की विधि और उसके प्रदाता की प्रामाणिकता सिद्ध हो. 


मेरे कुछ सुझाव आप को इस परिभाषा निर्माण में मदद कर सकते हैं. 


1. शिक्षित जीव का पहला अपेक्षित लक्षण यह है कि वह  तनाव से मुक्त हो और, उसमें बाल सुलभ प्रसन्नता जो उसे जन्म से ही प्राप्त है, बनी रहे. प्रसन्नता उसकी अपने अंदर की है और बाहर से नहीं आ सकती, या उसके लिये किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ता. चाहे कोई कुछ सीखे या न सीखे, किंतु प्रसन्नता को न खो देना या अपनी आत्मा को बचा लेना, ही शिक्षा का लक्षण है.  अप्रसन्न जीव कभी भी शिक्षित कहलाने योग्य नहीं है. शिक्षा की जो विधि जीव के मन को तनाव, अस्थिरता, तुलना या आत्महत्या के विचार से भर दे या उसकी मौलिक जीवंतता को नष्ट कर दे, उसे कुछ भी कह सकते हैं किन्तु शिक्षा नहीं. 


2. शिक्षित जीव का दूसरा अपेक्षित लक्षण यह है कि वह किसी  उचित समस्या का हल खोजे और उस समस्या के निदान में समर्थ बने. इस संघर्ष के चुनाव में जीवन में उसकी अपनी ही परिस्थितियाँ सहायक होंगी. इसे मेरिट या प्रतिभा कहते हैं.  क्षमता जैसे, तकनीकी रूप से दक्ष या काबिल होना प्रतिभा नहीं है, वह माध्यम है.  समस्या को दूर करने का उसका निर्णय, उसे इस बात के लिए मुक्त कर देती है कि वह कौन सा मार्ग या क्षमता, कब चुने. एक समस्या के समाधान के लिए हो सकता है कि उसे इंजीनियरिंग, समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र की आवश्यकता होगी और उसे वह चाहिये; किन्तु वह इंजीनियर या समाज शास्त्री या अर्थशास्त्री का प्रमाण पत्र ले कर अपने जीवन को कभी नष्ट नहीं करेगा. उदाहरणार्थ, अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालय सबसे पहले शिक्षा के ग्राहक को अपना स्टेटमेंट ऑफ पर्पस या जीवन का उद्देश्य या समस्या जिसके कारण  उसे शिक्षा पर निर्भर होना पड़ रहा है, लिख कर देने के लिए कहते हैं. जिससे वे, शिक्षा प्रदाता, उस आगंतुक के लिए अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकें. यह नीति यह स्पष्ट करती है, कि शिक्षा प्रदाता उसे सभी आवश्यक संसाधन देंगे किन्तु शिक्षित होना उसका अपना कर्तव्य है. 


3. शिक्षित जीव का तीसरा लक्षण यह है कि वह कभी भी किसी दूसरे के लिए घृणा का पात्र न बने और न ही वह किसी से घृणा करे. इसे सह अस्तित्व की समझ या सहिष्णुता भी कहते हैं. यह लक्षण उपरोक्त में वर्णित लक्षण से जुड़ा हुआ है. बिन लादेन की तरह आतंकवाद करने वाले क्षमतावान जीव, जब  जीवन के उद्देश्य जाने बिना या समस्याओं के उचित चुनाव के बिना, जब तकनीकी क्षमता पा लेते हैं तब वे ही उसका दुरुपयोग करते हैं. किसी के पास जब कोई अनावश्यक बंदूक हो तो वह उसका दुरुपयोग करेगा ही. यही अनावश्यक सिद्धि या ज्ञान, उस जीव को घृणा करना सिखाती है और उसे घृणित भी बना देती है. जिस शिक्षा को धन ले कर किन्तु बिना पात्रता के दिया जाता है उसका दुरुपयोग होता है, और इससे हानि होती है. उस पतित जीव के कर्म, स्वभाव और चरित्र किसी भी के लिए प्रेरणास्रोत नहीं हो सकते. 


मेरी अभी तक की बुद्धि ने शिक्षा की यही परिभाषा समझी है. संभव है कि भारतीय शिक्षा नीति में यह विचार, भारतीय नागरिकों के लिए बोधगम्य हों. 
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शिक्षा देने और लेने की एक सीमा होती है. इसी को विषय, सब्जेक्ट या स्कोप भी कहते हैं. यही कारण है कि शिक्षा प्रदाता उसे किसी को, निश्चित मात्रा या सीमा जिसे वे डिग्री कहते हैं, में देते हैं. दरअसल, शिक्षा की यह मात्रा या डिग्री, जीव को आश्वस्त करता है कि वह किसी कार्य के संपादन में कितने पब्लिक रिस्क या खतरे के लायक है. जब किसी ट्रक ड्राइवर को लाइसेंस दिया जाता है तब उसे उतना सबकुछ सिखाया जाता है जिससे वह ट्रक चलाने में स्वीकृत पब्लिक रिस्क लायक रहे. यही हाल सभी उन क्षमता के देने लेने जैसे चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, आदि पब्लिक रिस्क के विषयों के लिए आवश्यक होते हैं.


 साहित्य या कला या संगीत या योग जो किसी के लिये भी पब्लिक रिस्क नहीं होते और स्वांतः सुखाय ही होते हैं, उनमें डिग्री या शिक्षा की मात्रा की उतनी नाप तौल आवश्यक होती भी नहीं और कर भी नहीं सकते. इन क्षेत्रों में शिक्षा प्रदाता, किसी डिग्री को देने में समर्थ नहीं हो पाते. इन क्षेत्रों में जीव अपनी इच्छा से जितना चाहे सीख सकता है और उसके लिये वह स्वतंत्र होता है. भारत में, हानिकारक संभावना वाले शिक्षा जैसे चिकित्सा कानून आदि, को उसके पब्लिक रिस्क के अनुसार नियंत्रित किया जाता है किन्तु उसमें उस नियंत्रण की सफलता या उसकी उपयोगिता का कोई आकलन नहीं होता. इस बिंदु पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि बिना किसी वैज्ञानिक आधार से, शिक्षा जनित रिस्क नियंत्रक, स्वयं भी भ्रष्ट हो सकते हैं. इसका फल यह होगा कि डिग्री या मात्रा का प्रमाणपत्र बिकने लगेगा. 


शिक्षा जो सीमित है  उस की उपयोगिता जीव को ज्ञान द्वारा अपने आप में निर्भर बना देने पर समाप्त हो सकती है. ज्ञान या शोध की अपनी वह आत्म निर्भरता है जिसके लिए शिक्षा भी एक माध्यम है. विद्या अर्थात आत्म बोध जो जीवन के उद्देश्य की ओर चिंतन को ले जाता है, उसे कहते हैं. सिद्धांत पर चिंतन करने से यह लगता है कि शिक्षा के स्थान को विद्यालय कहना उचित नहीं. विद्या, बोध के मार्ग को कहते हैं. इससे आत्म विश्वास का जन्म होता है और संसार से भय नष्ट हो जाता है . आज के युग में शिक्षा, व्यवसाय और सांसारिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए है जबकि विद्या का लक्ष्य सत्य की खोज होती है. इसी तरह सत्य अंतिम स्थिति है. फिलहाल, शिक्षा नीति को यह भी संकेत देना होगा कि शिक्षा वह आरंभिक यात्रा है जिससे जीव को अवसर प्राप्त होने पर, अपने आप, आत्म निर्भर हो कर सोचने का सामर्थ्य, जिसे ज्ञान कहते हैं की संभावना बन जाता है. और तदुपरांत, वह विद्या के मार्ग से होता हुआ, सत्य तक पहुंच सकेगा. इस गूढ़ विषय की चर्चा का अभी कोई लाभ नहीं. 


आप को यह विस्तृत पत्र लिखने का साहस मुझे परमात्मा की प्रेरणा से हुआ है, और यदि भारत के नागरिक इस विचार से यदि लाभ ले सकते हैं तो, यह निवेदन स्वीकार करे और इस शिक्षा नीति को सुबोध और उपयोगी बना ने की कृपा करें. आप यदि चाहेंगे तो मेरी सेवा आप को समर्पित मिलेगी. 


आप का शुभचिंतक और भारत का साधारण किन्तु चिंतित नागरिक 


कृष्ण गोपाल मिश्र 
9312401302 


735 sector 39 
GURGAON 122002