A Law Must Be made against political parties who make False promises before election

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नमस्कार मित्रो, आज मैं आपके सामने अपनी बात रखने जा रहा हु कृपया ना इसे मेरे धर्म से जोड़ना, न मेरी कास्ट से या ना ही इसे क्षेत्रवाद,जातिवाद, भाषावाद या किसी पोलिटिकल पार्टी के साथ या उसके खिलाफ. ये एक आम हिंदुस्तानी के दिल से निकली हुई आवाज है. आज में आपसे एक आम आदमी की तरह बात करना चाहूंगा. एक पागल आम आदमी की तरह. पागल इसलिए क्युकी मेरे देश की सरकारों को जिसे आप और हम खुद चुनते है, हमारे मुद्दे सुलझाने के लिए दरअसल वो हमें पागल समझती है. उन्हें लगता है की इस देश की जनता पागल है तभी तो चुनावो के समय वो हज़ारो वादे करते है, कई रंगीन सपने दिखाते है और जैसे ही चुनाव खत्म हुआ और इनको राजगद्दी मिली की वो सारे वादे हवा हो जाते है और आम लोगो का शोषण शुरू हो जाता है. इनको लगता है जनता तो मुर्ख है, चुनावो के समय वादे करो और फिर जैसे ही कुर्सी मिले तो इनको धमकाना शुरू कर दो ताकि ये आम मुर्ख लोग अपने आप ही चुप हो जायेंगे. बात को ज्यादा घुमाने फिराने की जगह में सीधा मुद्दे पे आता हु. मुंबई महानगर पालिका चुनाव के समय पोलिटिकल पार्टी ने घोषणा की, घोषणा ही नहीं बकायदा अपने मैनिफेस्टो में सबसे ऊपर इस बात को तवज्जो भी दी की अगर इस बार बीएमसी में हमारी सरकार बनी तो हम जो लोअर मिडिल क्लास फैमिली मुंबई में रहती है उनको एक बड़ी राहत देते हुए ५०० स्क्वैर फ़ीट से छोटे मकानों का प्रॉपर्टी टैक्स माफ़ कर देंगे. उसकी सहयोगी पार्टी ने भी इस बात में हामी भरी की हां इस तरह की सुविधा लोअर मिडिल क्लास लोगो को मिलनी चाहिए. आम लोगो ने इनके वादों पे भरोशा करके इनको बहुमूल्य वोट दिया लेकिन जैसे ही इनकी सरकार बनी, ये अपनी बात से पूरी तरह मुकर रहे है. बताइये हर तरफ इनकी ही सरकार है लेकिन फिर भी ये बहाने बना रहे है,एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे है, कह रहे है की ये तो पॉसिबल ही नहीं दिख रहा. क्या आपको ये विचित्र बात नहीं लगती? ये इतना मुश्किल भी नहीं है पर चलो इनको बहाने ही बनाने है तो क्या कहे. मेरा सवाल है की अगर आपको ये काम करना ही नहीं था तो ये झूठे चुनावी वादे क्यों? आखिर क्यों चुनाव से पहले आपकी जुबान कुछ और रहती है और चुनाव के बाद कुछ और. मेरा फ्लैट भी ५०० स्क्वायर फ़ीट से कम है, जब चुनावी घोषणा हुई तो हमने राहत की सांस ली की चलो पोलिटिकल पार्टिया आम लोगो के हक़ के लिए देर से ही सही कम से कम इस बार तो जगी. मुंबई में रहने वाले एक लोअर मिडिल क्लास फैमिली के लिए घर का गुजारा चलाना कितना मुश्किल होता है ये कोई भी मुंबई में रहने वाला आम इंसान समझ सकता है. ऐसा लगा जैसे दुनिया के सबसे महंगे शहरो की गिनती में आने वाला मुंबई, यहाँ रहने वाले आम लोगो के लिए कुछ राहत भरी खबर लेकर आया. पर अभी जैसे ही चुनावी समर ख़त्म हुआ की धीरे-धीरे इनका असली रूप बाहर आने लगा. मुझे बीएमसी अफसर का फ़ोन आया की मुझे प्रॉपर्टी टैक्स भरना पड़ेगा, जब मैंने उन्हें बताया की आपके ही सुप्रीमो ने ये घोषणा की थी की उनकी सरकार बनी तो ५०० स्क्वायर फ़ीट से कम की जगह का प्रॉपर्टी टैक्स माफ़ कर देंगे बकायदा ये मैनिफेस्टो में भी दर्ज था तो वो कहने लगे की ऐसा कुछ नहीं है वो तो चुनावी वादे थे ऐसा कुछ नहीं हुआ है और आपको पैसे तो भरने पड़ेंगे और अगर मैंने प्रॉपर्टी टैक्स नहीं भरा तो वो मेरा फ्लैट सील कर देंगे. मेरे लिए ये बड़ा हैरान करने वाला अनुभव था की आखिर ये हो क्या रहा है? उनकी बात जहन में कई सवाल छोड़ रही थी या यु कहे की एक आम इंसान को उसकी असली औकात दिखा रही थी की आखिर आम लोग इन पोलिटिकल पार्टियों के लिए है क्या? पोलिटिकल पार्टिया इस देश के आम लोगो को समझती क्या है. ये दोष सिर्फ किसी एक पार्टी का नहीं है पर हर जगह यही हाल है चुनावो से पहले ढेर सारे वादे किये जायेगे कोई कहेगा अगर हम जीते तो हर एक के बैंक खाते में १५ लाख आ जायेगा तो कोई कहता है की ये सत्ताधारी पार्टी करोडो अरबो रूपए के घोटाले कर रहे है और काला धन इनके पास है अगर हम आये तो इनके खिलाफ कार्यवाही करेंगे और वो अरबो रूपए वापस देशवासियो में बाँट दिए जायेंगे. पर जब ये पार्टी सरकार में आती है तब ना तो काला धन का पता होता है, ना विदेशो में रखने वाले काला धन के लोगो के नाम उजागर हो पाते है और ना ही बड़े घोटालेबाज़ों पे कार्यवाही हो पाती है. आम लोगो के बैंक खातों में पैसे आने की बजाय वो टैक्स के बोझ तले दब जाते है और वो लोग अपनी पार्टी के फायदे के लिए आम लोगो की जेबें साफ़ करने पर आ जाते है. मेरा कहना सिर्फ इतना है की आखिर देश में ऐसी नौटंकी क्यों होती है और ऐसा कब तक चलता रहेगा? कही न कही तो आखिर इन सब चीज़ो को रोका जाना चाहिए. कब तक देश के ये नेता देश के आम लोगो को बेवकूफ बनाते रहेंगे और कब तक हम आम पब्लिक बेवकूफ बनती रहेंगी? अगर चुनावो में वादे किये जाते है तो उन्हें पूरा किया जाना चाहिए और अगर कोई पोलिटिकल पार्टी चुनाव जीतने के बाद भी अपने वादे पुरे नहीं करती तो या तो उस पोलिटिकल पार्टी के फण्ड से  उसे जनता को किया हुआ वादा पूरा करवाना चाहिए या अगर वो ऐसा नहीं करते तो फिर सरकार को बर्खाश्त करके वापस चुनाव करवाने चाहिए तभी झूठे वादों पे और आम लोगो को बेवकूफ बनाने पे रोक लग पायेगी. क्युकी अगर जो चीज़ पॉसिबल ही नहीं है या जो काम आप नहीं कर सकते तो ऐसा चुनाव से पहले कोई वादा करो ही मत पर अगर फिर भी आप जबर्दश्ती वादा कर रहे हो तो फिर आपको उसे निभाना भी पड़ेगा फिर आप ना-नुकर नहीं कर सकते. में चाहता हु की इस मामले को और आगे तक लेकर जाऊ. मैंने अभी बीएमसी  हेडक्वार्टर से आरटीआइ के जरिये जवाब माँगा है और जैसे ही इसका जवाब आता है उसके बाद में इस मुद्दे को पीआइएल डालकर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ले जाना चाहता हु. में चाहता हु की ये मुद्दा आम लोगो के लिए एक रोल मॉडल बने.

अक्सर लोगो को लगता है की सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लड़ना मुश्किल है या आम लोगो के पास ये अधिकार नहीं है की वो सरकार के खिलाफ आवाज उठा सके. अगर आप भी ऐसा सोचते है तो आपको समाज के लिए लड़ने वाले उन अनगिनत सामाजिक कार्यकर्ताओ को धन्यवाद् देना चाहिए जिनके अथक प्रयास से आज इस देश का कानून इस मुकाम पे पहुंच पाया है की एक साधारण सा आम इंसान भी देश की सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सकता है और वो भी सिर्फ ६० रूपए खर्च करके. जी हाँ आपने बिलकुल सही पढ़ा, आप आरटीआइ एक्ट के तहत देश की किसी भी सरकारी संस्थान से किसी भी सवाल का जवाब मांग सकते है और उन्हें आपको जवाब देना ही होगा और इसके लिए आपको खर्च करने पड़ेंगे सिर्फ १० रूपए. अगर आपको लगता है की सरकारी संस्थान में या सरकार की गलत नीतिया देश के आम लोगो के लिए सही नहीं है तो आप देश की किसी भी हाई कोर्ट में पीआइएल डाल सकते है और उसका खर्च है सिर्फ ५० रूपए. मतलब इस देश में चाहे ६० रूपए में आपको भरपेट खाना मिले ना मिले लेकिन आपको यहाँ ६० रूपए में न्याय मिलने की उम्मीद जरूर है. हालांकि अभी तक हम न्यायप्रक्रिया में सिर्फ आधे रास्ते तक ही पहुंचे है अभी और नए कानून लाने की आवश्यकता है ताकि आम लोगो को जल्दी और निष्पक्ष न्याय मिल सके. ये लड़ाई मेरे अकेले की नहीं है पर हर उस आम इंसान की लड़ाई है जो कही ना कही देश में बढ़ती गन्दी राजनीती से परेशान है. में चाहता हु ये मुद्दा मैं कोर्ट में बिना किसी वकील के खुद ही लडू ताकि ये देश के लिए एक रोले मॉडल बने की आपका इरादा अगर मजबूत हो तो आप चाँद के सीने में भी छेद कर सकते है. चाहे में ये केस हार भी जाऊ तो भी कोई गम नहीं क्युकी आखिर मैंने कोशिश तो की आम लोगो को जगाने की. देश को कभी सरकार नहीं चलाती, देश को उसकी जनता चलाती है और जब तक जनता मुर्ख बनी रहेगी तब तक उसको मुर्ख बनाने वाले मिलते रहेंगे जिस दिन देश की जनता ने आँखे खोल के अपने दिमाक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया ये देश बहुत आगे पहुंच जायेगा. में एक छोटे से गांव से हु, बचपन में जब भी हम पढ़ते थे की देश प्राचीन काल में बहुत अमीर और सबसे आगे था परन्तु जब से देश के लोग आपस में ही लड़ने लगे तो देश गुलामी की जंजीरो में जकड गया,आज देश में व्यवस्था चरमराई हुई है और देश की गिनती गरीब देशो में आती है क्युकी देश में ब्रेन ड्रेन जैसी स्तिथि हो चुकी है, ऐसा नहीं है देश में टैलेंटेड लोग नहीं है परन्तु कोई भी हाई क्वालिफाइड बंदा इस देश में रहना नहीं चाहता और पश्चिमी देशो में बसना चाहता है. हमें ये पढ़ कर बहुत अफ़सोस होता था और हम सोचते थे की जब हम बड़े होंगे तब हम इस देश को वापस सबसे टॉप पर ले जायेंगे. जब बड़े हुए तो देश को एक तरफ रखकर बस अपने लिए ही काम करने लगे. आज जब ये मैटर मेरे सामने आया तो दिल से एक आवाज उठी की मुझे कुछ करना चाहिए, अपने देश के लिए, अपने समाज के लिए, अपने लोगो के लिए, अपने आने वाली पीढ़ी के लिए. आखिर किसी ना किसी को तो आवाज उठानी ही होगी और क्यों नहीं इसकी शुरुआत में अपने से करू. मैं आखरी तक लडूंगा अपने देश को एक बेहतर देश बनाने के लिए. पहले रावण को मारने के लिए राम का जन्म हुआ था पर आज हालत बिलकुल अलग है, आज गली गली से रावण निकल रहे है. अगर हम इस देश को बचाना चाहते है तो हर गली गली से किसी ना किसी को राम बनकर निकलना ही पड़ेगा तभी ये देश बच पायेगा. मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता जब तक इस देश की आम पब्लिक मेरे साथ नहीं है. अगर आप मेरी बात से सहमत है तो कृपया इस मुहीम का हिस्सा बनिए और इसे और आगे ले जाइये और इस देश को बदलने में उसका हिस्सा बनिए. धन्यवाद्. जय हिन्द.



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