लड़कियों की स्कूल यूनिफॉर्म सलवार-कुर्ता, चुन्नी क्यों हो

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मेरी बेटी कक्षा 4 में पढ़ती है। देहरादून के उसके स्कूल में कक्षा 6 से लड़कियों के लिए स्कूल यूनिफॉर्म में सलवार-कुर्ता और चुन्नी शामिल है। मौजूदा समय में ज्यादातर इस उम्र की लड़कियां ये लिबास नहीं पहनती हैं। मेरी बेटी को ये सहज नहीं लगता है। स्कर्ट, ट्यूनिक या फिर पैंट शर्ट उनके लिए सहज लिबास हैं। जिसमें वे खुद को जैसा समझते और पाते हैं, वैसा ही महसूस करते हैं।

सलवार-कुर्ता-चुन्नी सिर्फ कपड़े नहीं हैं, ये एक सोच भी है। ये यूनिफॉर्म लड़कियों की मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं और उन्हें ऐसे कपड़े क्यों पहनाये जा रहे जैसे सवालों पर ले जाती हैं। 

मेरी बेटी मुझसे कहती है कि मेरा स्कूल बदल देना और मुझे ऐसे स्कूल में डालना जहां ऐसे यूनिफॉर्म न हों। वह मुझसे पूछती है कि इस तरह का यूनिफॉर्म क्यों बनाया गया। मैंने उसे समझाने की कोशिश की, कि हमारी सरकार को लगा कि इस तरह के कपड़े लड़कियों की सुरक्षा उन अपराधों से सुरक्षा कर सकते हैं, जिनके बारे में अभी इन लड़कियों को बहुत जानकारी नहीं।

मैंने उसे गुड टच, बैड टच जैसी चीजें भी समझायी हैं। वो बातें उसे असहज कर रही थीं। वह उन्हें नहीं सुनना चाहती थी। 

मेरा मानना है कि स्कूल के बाद कॉलेज में भी अब पैंट-शर्ट का प्रचलन है। तो स्कूलों में भी क्यों न लड़कियों के लिए यही यूनिफॉर्म लागू किया जाए। इसमें वे खुद को सहज भी पाएंगी। या फिर उन्हें इसके लिए विकल्प दिया जाए।

हम लडकियों पर जबरन सलवार-कुर्ता थोप रहे हैं, ये अपराध और बुरी नज़र से बचने के लिए बुरका पहनाने जैसा ही कुछ है।