कामयाबी

The pattern of Civil Services Examination should be reviewed and CSAT must be made qualifying & merit must be decided on the paper of General Studies.

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सिविल सेवा की परीक्षा में जो सीसेट प्रणाली लागू की गयी है वह पूर्णत: ग्रामीण भारत के छात्रों की विरोधी है और उनकी सफलता में भारी गिरावट आई है जबकि शहरी और विशेषकर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित छात्रों के संख्या तेजी से बढ़ी है. यह न केवल भारत के संविधान की मूल भावना के पूर्णत: ख़िलाफ है बल्कि यह देश की सामाजिक संरचना के लिए भी घातक है और देश में ग्रामीण एवं शहरी वर्ग के आधार पर सामाजिक विभाजन पैदा करने का एक नया उपकरण है. जिस तरह से नए पैटर्न में केवल उच्च वर्गीय "इंडिया" के स्टूडेंट्स का ही सिलेक्शन हो रहा है (जोकि UPSC की रिपोर्ट्स से साफ दिखता है) यदि यही क्रम जारी रहा तो 20-25 साल में देश में एक नए तरह की खाई पैदा होगी और "इण्डिया vs भारत" में एक और दरार बढ़ जायेगी जो "इंडिया" और "भारत" दोनों के लिए ही नुकसानदायक होगी.

अत: परीक्षा की पद्धति कैसी हो इससे ज्यादा जरूरी है देश के शासन-प्रशासन में समाज के हर वर्ग की भागीदारी, क्योंकि यही भारत के संविधान की "आत्मा" के अनुकूल है जो यह कहता है की "हम भारत के लोग..." और जो "समानता का अधिकार" भी देता है.

किसी भी एकपक्षीय निर्णय से क्या समस्याएं पैदा होती हैं उसका ज्वलंत उदाहरण नक्सलवाद है. साथ ही "ग्रामीण भारत vs शहरी इण्डिया" के भेद से भी कोई इंकार नहीं कर सकता. ये समस्यायें सरकारों के इसी तरह के एकपक्षीय निर्णयों के कारण एक लम्बे समय में देश में पैदा हो गयी हैं और अब ऐसा नासूर बन गयी है कि ये "इंडिया" और "भारत" दोनों की लिए परेशानी का सबब हैं.

इसलिए, हो सकता है की हम इस नए पैटर्न के तथाकथित "aptitude test" से अपने मनपसंद नौकरशाह चुन ले, लेकिन यदि एसे चुनाव में हमारे समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है तो यह तो संविधान की और "लोकतंत्र" की मूल भावना की हत्या ही है. इससे समाज में दरारें ही पैदा होंगी जिसे कोई भी "योग्य" और कितना भी "योग्य" नौकरशाह भर नहीं सकता.

एसे में सोचने वाली बात यह है की इसका देश और समाज पर दूरगामी प्रभाव क्या होगा? क्या विभाजन की एक और खाई वास्तव में नहीं तैयार हो जाएगी? कोई निर्णय लेते समय इस सवाल का उत्तर खोजना सबसे पहले और बेहद जरूरी है. फिर चाहे परीक्षा का पैटर्न कैसा भी हो.

माननीय प्रधानमंत्री जी, यह देखा गया है की ग्रामीण परिवेश के छात्र बहुत मेहनती होते है, उनमें ज्ञान पाने की ललक, विश्लेषण करने की क्षमता, अंतर्वैयक्तिक कौशल, नैतिकता, देशप्रेम की भावना आदि उच्च स्तर में होती हैं, लेकिन उनकी शिक्षा ग्रामीण परिवेश में होने के कारण (जहाँ आज भी शिक्षा का स्तर इतना घटिया है की एक ग्रामीण छात्र को शिक्षा पाने के लिए किसी शहरी सुविधासंपन्न छात्र की तुलना में कहीं कई गुना ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है) वह शहरों के सर्वसुविधासम्पन्न स्कूलों और कालेजों से पढ़े छात्रों का मुकाबला प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं कर पाते. अतः जब तक पूरे देश में, चाहे वह गाँव हो या शहर, शिक्षा का स्तर एक सामान नहीं हो जाता तब तक ग्रामीण भारत को ध्यान में रखते हुए भी प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रणाली तैयार करना चाहिए.

इसलिए, यदि CSAT को केवल क्वालीफाइंग प्रकृति का बना दिया जाए और मेरिट सामान्य अध्ययन के प्रश्न पत्र के आधार पर निर्धारित की जाए तो यह समस्या समाप्त की जा सकती है, क्योंकि जैसा की निगवेकर समिति ने भी अपनी सिफारिश में कहा था की CSAT का प्रश्न पत्र शहरी वर्ग के छात्रों के पक्ष में झुका हुआ है.



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