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जी चाहता है चूम लूँ पाँव के उन छालों को आगे बढ़कर ,
जिन्होंने मेरा पेट भरने के लिए जमीन के साथ अपने पैर भी खोद डाले ।
दर्द छुपा कर वो अपना अब भी वतन के नोनिहालों की भूख के लिए लड़ रहे है ,
कैसे मौका प्रस्त है ये संसद के पत्थर चूमने वाले जिनको माँ के छालों में नक्सली दिख रहे है ।