याचिका बंद हो गई

Highlighting government and authorities apathy towards deserving DIVYANGS

यह मुद्दा 5 हस्ताक्षर जुट गये


नांगल चौधरी : कहते हैं कि परिस्थितियों से ही मनुष्य संघर्ष करना सीखता है।कुछ ऐसा ही चरितार्थ कर रहे है निजामपुर विकास खंड के गांव बायल का 20 वर्षीय पप्पू। शत प्रतिशत शारीरिक रूप से विकलांग होते हुए भी पप्पू ¨जदगी से इतना संघर्ष कर रहा है, कोई सोच भी नही सकता। पप्पू दोनों पैरों से विकलांग है धरती परहाथों के बल रेंग कर चलता है। फिर भी किसी के सामने हाथ फैलाने की बजाय 'बायल' बस स्टैण्ड पर टायर पंचर की दुकान चलाकर लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बना हुआ है।मां की बीमारी ने ही पप्पू को विकलांग होते हुए सबल बना दिया है। बड़े ट्रकों के टायर खोलकर पेंचर लगाना पप्पू की दिनचर्या बन गई है। बेहतरीन तरीके से काम करने पर वाहन चालक भी पप्पू से ही टायर पेंचर का काम करवाते हैं। चिलचिलाती धूप को अपने सिर पर वहन कर विकलांगता को मात देते हुए वह काम को बोझ नहीं समझता है। इस तरह से दिनभर काम कर पप्पू अढ़ाई सौ से तीन सौ रुपये की अपनी दिहाड़ी आसानी से बना लेता है। इस मेहनत के पैसे से ही वह अपनी मां का इलाज करवा रहा है।एक घटना ने बदल दी जीवन की दशा :दलित परिवार से ताल्लुक रखने वाले पप्पू ने बताया कि वह जन्म से विकलांग है। वैसे तो वे पांच भाई हैं,जिनमें चार विवाहित हैं और वह अकेला अविवाहितहै। पिता का साया सिर से उठ गया। उसने बताया कि चारों भाई अलग रहते है। वृद्ध मां उसके पास रहती है जिसकी जिम्मेदारी उन पर ही है। पप्पू ने बताया कि एक घटना ने उनके जीवन की दशा को बदल दिया है। एक बार मां बीमार हुई। उसके पास इलाज के लिए पैसे नही थे। उसने सम्पन्न लोगों से मां के इलाज के लिए उधार पैसे मांगे, लेकिन सुबह से सायं हो गई, उन्हें किसी ने भी एक पैसा उधार नही दिया। इसके बाद उन्होंने रात को मन में ठान ली कि कोई काम शुरू करेंगे। लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते उन्हे टायर पंचर की दुकान खोल ली।घर से वह हाथों के बल करीब प



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