#HamariSalary: दिल्ली के 8000 MCD शिक्षकों को सैलरी दें

0 व्यक्ति ने साइन किए। 5,000 हस्ताक्षर जुटाएं!


नौकरी मिलना किसी के भी जीवन की सबसे बड़ी खुशी होती है पर हमारी नौकरी तो मानो हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुख बन गई है।

मैं दिल्ली नगर निगम की एक टीचर हूँ, मेरे जैसे लगभग 8000 और टीचरों को पिछले 3 महीने से सैलरी नहीं मिली है। इसीलिए मैंने ये पेटीशन शुरू की है ताकि हमें समय पर सैलरी मिले। मेरी पेटीशन साइन और शेयर करें।

हमारे साथ ये अन्याय पिछले 4 साल से चल रहा है। कभी-कभी तो 6-6 महीने तक सैलरी नहीं मिलती है। इस जानलेवा महंगाई में कोई एक दिन बिना सैलरी के नहीं गुज़ारा कर सकता। हम बिना सैलरी के परिवार चलाने को मजबूर हैं।

किसी को मकान की किश्त देनी थी तो किसी को अपने बच्चों की फीस, किसी के माता-पिता की बीमारी का इलाज रुक जाएगा। कुल मिलाकर सैलरी से चलने वाला व्यवस्थित जीवन अस्तव्यस्त हो गया।

हम टीचरों के झोलों में किताबों के साथ ये चिंता भी है कि सैलरी नहीं मिली तो हमारा क्या होगा। हम जहाँ भी जाते हैं हमारी ये पीड़ा किसी न किसी रूप में छलक ही जाती है। इंटरवल के समय जब हम खाने की टेबल पर 20 मिनट के लिये इकट्ठा होते हैं तो चिंता की लकीरें चेहरे पर दिखती हैं।

अपनी समस्याओं को लेकर हमने क्या नहीं किया धरना प्रदर्शन लगातार करते रहे, आश्वासन भी मिलता रहा पर परिणाम शून्य ही रहा। कई बार कोर्ट का आदेश हुआ कि कर्मचारियों को तय समय पर वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए। इस आदेश से हम बहुत ही आशान्वित थे कि चलो अब सब पटरी पर आ जायेगा। पर परिणाम “ढाक के तीन पात”।

दोनो सरकारें आरोप प्रत्यारोप करतीं रहीं और कर्मचारी दोनों पाटों के बीच पिसते रहे। संवेदनहीन सरकारें सोई रहीं और हमारी नींदे हमसे रूठ गई। जब इस देश में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना हो रही है तो किसकी सुनी जाएगी?

हमारी लाचारी खुद का ही उपहास उड़ाने लगी। मददगार भी दूर होने लगे, कहने लगे तुम्हारा रोज का रोना हो गया है। सही भी है, कौन कब तक मदद करेगा? बैंक वाले भी हमसे दूर भागते हैं।

टीचर पूरी ईमानदारी से अपना सारा काम करते हैं। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, मतगणना, एन केन प्रकारेण सभी के लिये डटे हैं। सोचते हैं हर रात के बाद एक नयी सुबह होती है वह सुबह कभी तो आयेगी उसी की प्रतीक्षा हम सब कर रहे हैं।

हमारी पेटीशन पर हस्ताक्षर करें और इसे इतना शेयर करें कि हर घर में हमारे दुखों की कहानी पहुँचे और सोती सरकारें जागें और हमें हमारी सैलरी दें।