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हिन्दी फिर हासिल करे पहला संवैधानिक अधिकार -डॉ0 शर्मा
September 24, 2018Uncategorized












 

मथुरा आकाशवाड़ी के पखवाड़े में हिन्दी की संवैधानिक पुनर्प्रतिष्ठा पर सवाल
मथुरा,
भाषा वैज्ञानिक विशिष्टताआंें समेत संसार की समस्त भाषाओं के स्वराघातों को लिपिबद्ध करने की अद्भुत क्षमता के वर्चस्व पर 1 मई 1793 से ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार के प्रथम भारतीय संविधान संविधान की सुर्खियों में छाई हिन्दी पूर्व अधिकार हासिल किये बगैर जीवन्त नहीं होगी।
यह बात आकाशवाणी केन्द्र मथुरा के तत्वावधान में 14 सितम्बर को हिन्दी पखवाड़ा के उद्घाटन सत्र पर आयोजित कार्यक्रम में डॉ0 रमेश चन्द्र शर्मा स्मारक शोध एवं सेवा संस्थान के संस्थापक अध्यक्ष एवं 18 अप्रैली विश्व हिन्दी दिवसीय आन्दोलन के अन्तरराष्ट्रीय प्रवर्तक डॉ0 सुरेश चन्द्र शर्मा ने बतौर मुख्य वक्ता कही।
डॉ0 शर्मा ने खुलासा किया कि लेखन कला और लोक व्यवहार की मजबूत बुनियाद के चलते देवनागरी (हिन्दी) ने ‘सदरे रियासत’ और ‘सदर दीवानी अदालत की मुहर’ से यात्रा करते हुए 1809 में कम्पनी सरकार के सिक्कों पर कब्जा जमा लिया था और उससे पहले फोर्ट विलियम से निर्गत आदेश के तहत हिन्दी भाषी इलाकों की राजस्व एवं न्यायिक व्यवस्था के संचालन की प्रमुख भाषा बन चुकी थी। आगे कहा कि बहुआयामी विशिष्टताओं और अभिव्यक्ति की वैज्ञानिक व्यवस्था से लैस हिन्दी ने प्राच्य विद्या के मूर्धन्य विद्वान एवं कालान्तर में एशियाटिक सोसायटी के अध्यक्ष सर विलियम जोन्स से लन्दन के हाउस ऑफ कामन्स में वर्चस्व का लोहा मनवा लिया था जिसके चलते उन्हें जबरन रोमन लिप्यन्तरण पर अनेक मुश्किलें उठानी पड़ी थी। मगर देवनागरी के मुकाबले रोमन को खड़ा करने में जोन्स का प्रयास थमा नहीं और अंग्रेजी ने कुलियों के समाज से निकलकर विश्व भाषा का दर्जा हासिल कर लिया। दुर्भाग्य से हिन्दी को इंग्लैंड सरीखा संरक्षण और जोन्स जैसे निष्ठावान विद्वान नहीं मिल सके जिसके चलते वह सर्वगुण सम्पन्न होने के बावजूद विश्व की क्या कहें भारत में भी अंग्रेजी जैसा स्थान नहीं बना सकी। फिर भी नागरी अपने समर्थन में फ्रेडरिक जॉन शोर जैसे विद्वानों को खड़ा कर फारसी से बराबरी का लोहा लेने में कामयाब रही। हालांकि वर्चस्व के युद्ध में उसे 1835 से कम्पनी के सिक्कों से हाथ धोना पड़ा लेकिन उसने 1837 से फारसी को सरकारी कामकाज से बाहर कर आनन्दमठ उपन्यास की भूमिका तैयार की।
डॉ0 शर्मा ने रोष जताया कि अनेक खूबियों के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी की आंखों का नूर साबित होने के बावजूद हिन्दी के विकास में रोड़े अटकाये जाते रहे और उसके स्थान पर इण्डियन टोल्स एक्ट 1851, भारतीय रेल कानून 1854 की तर्ज पर भूमि निबंधन अधिनियम, भू अभिलेख संरक्षण अधिनियम समेत फोर्ट विलियम से निर्गत अन्य अधिनियमों के सरकारी कामकाज में देशी भाषा के बहाने पर्सियनाइज्ड उर्दू का उपयोग किया जाता रहा जिसके विरोध में जॉन बीम्स, डॉ0 फैलन, एफ0 एस0 ग्राउज, फ्रेडरिक पिंकौट, राजा शिवप्रसाद, मुस्लिम सोसायटी, रेवरेंड जे0 डी9 बेट रेवरेंड एस0 एच0 केलाग आदि विद्वान समय-समय पर विरोध करते रहे। नतीजन 1856 में सरकारी कामकाज के लिए नागरी ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया। मगर इसी बीच 1857 की क्रान्ति ने स्थितियां उलट दीं और रोमन लिप्यन्तरण के बाद हिन्दी के प्रति अंग्रेजों का रहा -सहा सम्मान जाता रहा जिससे सरकार ने नागरी (हिन्दी) की अनिवार्यता पर जोर देना बन्द कर दिया। उत्तरोत्तर 1867 तक गंगा के जहाजरानी अधिनियम में कर वसूली के लिए पहली बार उर्दू का उल्लेख किया गया। तत्पश्चात् महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण तक 1877 में संयुक्त प्रान्त में सरकारी सेवाओं के लिए अंग्रेजी और उर्दू अनिवार्य भाषायें घोषित हो गई और श्रीरामचरितमानस व सूरसागर की रचना स्थली में हिन्दी को सरकारी व्यवहार से बर्खास्त कर दिया गया। कहा कि सरकार के एकपक्षीय फैसले के विरोध में भारतेन्दुमण्डल के प्रख्यात वृन्दावनी साहित्यकार राधाचरण गोस्वामी ने भाषावर्द्धिनी सभा अलीगढ़ की ओर से 1882 में 21,000 हस्ताक्षरों का ज्ञापन शिक्षा कमीशन को दिया था। तत्पश्चात् उन्होंने 75,000 हस्ताक्षरों का ज्ञापन देने का प्रण उठाया था। इस बीच और भी छिटपुट प्रयास चलते रहे लेकिन कोई ठोस नतीजा तक तब निकलता नहीं दिखाई दिया जब तक कि भारतरत्न महामना मदनमोहन मालवीय ने 60 वर्षों से चलती आई देवनागरी की दुर्दशा के उद्धार का संकल्प नहीं उठाया। अंततोगत्वा 17 गणमान्य सदस्यों के प्रतिनिधिमण्डल की स्वीकृति से 1897 में संयुक्त प्रान्त के लेफ्टिनेंट गवर्नर एंटोनी अपैरल मैक्डोनल्ड को दिया गया ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजूकेशन इन एन0 डब्ल्यू0 प्राविंसेस एण्ड अवध’ नामित 104 पृष्ठीय ज्ञापन मील का पत्थर साबित हुआ और ब्रिटिश सरकार को उसके अकाट्य तर्कों के आगे घुटने टेकने पड़े । तत्पश्चात् 63 वर्षों बाद हिन्दी 18 अप्रैल 1900 के दिन नैनीताल कार्यालय से निर्गत आदेश के मुताबिक सरकारी कामकाज में पुनः प्रतिष्ठित हो सकी।
डॉ शर्मा ने बताया कि संयुक्त प्रान्त में हिन्दी की आजादी का असर पूरे देश में हुआ और वह समाचार पत्र-पत्रिकाओं समेत विश्वविद्यालयों के पठन-पाठन मंे निरन्तर अग्रसर होती गई । उसी दौर में 1915 में भारत आगमन के बाद भ्रमण पर निकले महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय एकता और उत्तर -दक्षिण भारत के बीच संवादवर्द्धन के मद्देनजर 1918 में दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार सभा की शुरूआत की। उससे प्रभावित होकर 1937 में मद्रास प्रेसीडेंसी के प्रमुख चक्रवर्ती राजागोपालाचारी ने सूबे में प्राथमिक कक्षाओं के लिए हिन्दी अनिवार्य कर दी थी। आगे कहा कि दुर्भाग्य से महात्मा गांधी के दूरगामी नजरिये का मौजूदा सरकार ने अनुपालन नहीं किया और वर्ष 2018 में दक्षिणी प्रयोग के सौ वर्ष पूरे होने पर भी 11वां विश्व हिन्दी सम्मेलन मॉरीशस में आयोजित कराया। कहा कि देश की आजादी तक आते-आते हिन्दी पूरी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी थी किन्तु तमाम कोशिशों के बावजूद वह फारसी के पंजे में कैद अपनी बेटी उर्दू को नहीं छुड़ा सकी जिसके ऊपर देश विभाजन का कुचक्र रचा गया। उसके अलावा आजादी के बाद सर विलियम जोन्स के रोमन लिप्यन्तरण से सबक नहीं सीखा गया और देवनागरी पाश्चात्य भाषाओं के लिप्यन्तरण में उपयोग नहीं की जा सकी जिसके चलते भी उसका अन्तरराष्ट्रीय पटल पर संभावित विकास अवरूद्ध रहा और वह रोमन से कमजोर होती गई।
डॉ0 शर्मा ने क्षोभ जताया कि आजादी के बाद कांस्टीट्यूअण्ट असेम्बली ने 18 अप्रैल की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार किये बगैर 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्रदान करते हुए स्वीकृति दिवस को हिन्दी दिवस भी घोषित कर दिया। जबकि ब्रिटिश भारत में संयुक्त प्रान्त का हिन्दी संघर्ष वस्तुतः राजभाषा का संघर्ष था। फिर भी पूर्व से चलते आये संघर्ष की ऐतिहासिकता को ठुकरा दिया गया। आगे कहा कि राजभाषा के पश्चात् 1975 के नागपुर सम्मेलन में फिर वही गलती दोहराई गई और ऐतिहासिक दिवस 18 अप्रैल के स्थान पर सम्मेलन की तारीख 10 जनवरी विश्व हिन्दी दिवस घोषित कर दी गई। आरोप लगाया कि आजादी के बाद हिन्दी का निजी हितों में उपयोग तो किया जाता रहा लेकिन उसके विकास पर सच्चे अर्थों में कार्य नहीं किया गया जिसके चलते 18 अप्रैली स्वातंत्र्य दिवस प्रदेश, देश और विश्व में स्थान नहीं बना सका।
इससे पूर्व मुख्य अतिथि समेत आकाशवाणी केन्द्र दिल्ली के उप महानिदेशक आदित्य चतुर्वेदी, मथुरा आकाशवाणी के कार्यक्रम अधीक्षक सर्वेश कुमार एवं कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ0 उमाशंकर राही ने माँ सरस्वती के चित्रपट पर माल्यार्पण एवं दीपोपहार से कार्यक्रम की शुरूआत की। तत्पश्चात् आकाशवाणी दिल्ली की ओर से प्रेषित हिन्दी सन्देश का वाचन किया गया। अगले क्रम में प्रतिभागियों को हिन्दी प्रचार टोकन वितरण पश्चात् व्याख्यान की शुरूआत हुई। तदुपरान्त उप महानिदेशक आदित्य चतुर्वेदी ने हिन्दी के विकास में रेडियो की भूमिका और डॉ0 उमाशंकर राही ने अध्यक्षीय पद से भावी संवर्द्धन पर काव्यांजलि प्रस्तुत की। आयोजन में मथुरा दूरदर्शन केन्द्र प्रभारी सत्यव्रत सिंह, पत्रकार सुनील शर्मा, दर्शन मर्मज्ञ डॉ0 महेन्द्र कुमार, मथुरा आकाशवाणीकर्मियों समेत गणमाण्य नागरिक उपस्थित थे। संचालन कार्यक्रम अधिशाषी ओ0 पी0 सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन केन्द्र अधिशाषी सर्वेश कुमार ने किया।