Petitioning Amar Ujala Goverment of India

Dadda Major Dhyan chand : Bharat Ratna for Magician of Hockey

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दीजिए हस्ताक्षर का योगदान, दद्दा को दिलवाना है सर्वोच्च सम्मान ...! 


याद है आपने आखिरी बार कब भीगी आंखों के साथ हाकी टीम को खेलते देखा था? अपने राष्ट्रीय खेल के साथ हंसना-रोना हम इसलिए भूल गए क्योंकि हमने हाकी के उन मसीहाओं को भुला दिया जो भारत में ही जन्मे थे। हमने हॉकी के विश्व नायक मेजर ध्यानचंद का नाम भुला दिया। दीजिए हस्ताक्षर का योगदान, दद्दा को दिलवाना है सर्वोच्च सम्मान ...!

 

प्रतिष्ठा में


प्रधानमंत्री कार्यालय
भारत सरकार

 आदरणीय प्रधानमंत्री जी

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा अखबार और देश का तीसरा सबसे ज्यादा पढ़ा जानेवाला समाचार पत्र होने के नाते अमर उजाला इसे अपना कर्तव्य समझता है कि वह उत्तरप्रदेश की धरती पर जन्मे स्वर्गीय मेजर ध्यानचंद को देश का सर्वोच्च सम्मान -- भारत रत्न -- दिलवाने के लिए अपने करोड़ों पाठकों के बीच एक अभियान चलाए।

महोदय्, सच तो यह है कि मेजर ध्यानचंद किसी एक प्रदेश के नहीं, पूरे देश के, बल्कि दुनिया भर के खेल प्रेमियों के लिए, एक पवित्र विरासत छोड़ गए हैं। ये विरासत हॉकी के लिए मुहब्बत की विरासत है। देश को लगातार तीन ओलंपिक गोल्ड दिलवाने वाले दद्दा ध्यानचंद ने 1928 से 1936 के बीच हॉकी में विश्व विजय का ऐसा सुनहरा अध्याय लिख डाला कि फिर वर्ष 1964 के टोक्यो ओलंपिक तक देश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज भी अंतरराष्ट्रीय हॉकी के इतिहास में भारत की गिनती सफलतम देशों में होती है।

लेकिन सवाल यहीं उठ खड़ा होता है? ऐसा क्यों है कि हॉकी में गौरव के पल खोजने के लिए हमें पचास साल पीछे लौटना पड़ता है? हमारी कीर्ति यात्रा साठ के दशक में ही क्यों ठिठक गई? वर्ष 1980 में जब आधी दुनिया ने ओलंपिक का बहिष्कार किया तो उसमें जरुर हमें एक अदद गोल्ड मिल गया लेकिन उसके बाद क्या? फिर तो 36 बरस बाद 1916 में जाकर रियो ओलंपिक में हमने बस इसी बात पर संतोष कर लिया कि आखिर हम नॉक आउट स्टेज तक तो पहुंचे।

प्रधानमंत्री जी, राष्ट्रीय खेल होने के बावजूद हॉकी की ये दुर्गति इसलिए हुई कि हमने हॉकी के भगवानों को भुला दिया। हमने उन खेल मसीहाओं को बिसरा दिया जो गरीब झोंपड़ियों में पैदा होकर उस बुलंदी पर पहुंचे थे कि जर्मनी में लोग उनकी हॉकी स्टिक छूकर देखते थे कि उसमें कहीं कोई चुम्बक या स्प्रिंग तो नहीं फिट है ...! यह बाबू ध्यानचंद जैसी हस्तियां थीं कि आजाद भारत ने हॉकी को अपने गौरव खेल का दर्जा दिया था। लेकिन फिर तो जैसे भारत की खेल यात्रा हॉकी के पराभव की ही कहानी बन गई। इधर कुश्ती, बैडमिंटन या निशानेबाजी में इक्का दुक्का मैडल आने लगे हैं। लेकिन उस सुनहरे दौर की वापसी कैसे हो जब हिंदुस्तान एक के बाद एक छह ओलंपिक मैडल जीतकर दुनिया में अपना परचम लहरा देता था।

देश का एक जिम्मेदार अखबार समूह होने के नाते अमर उजाला का मानना है कि जब तक हम हॉकी के रोल मॉडल नहीं पेश करेंगे, नई पीढ़ी इस खेल को उतनी गंभीरता से नहीं लेगी जितनी क्रिकेट या दूसरे खेलों के लिए दिखती है। हॉकी के लिए एक बाजार मॉडल भी विकसित करना होगा जिसकी बदौलत हॉकी खिलाड़ियों को सम्मानित जीवनयापन करने का आश्वासन मिले। लेकिन विडंबना ही है कि हॉकी के इतिहास का सबसे चमत्कारी व्यक्तित्व अपने यहां होने के बावजूद हम उसे नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श की तरह नहीं रख पा रहे हैं। स्वर्गीय मेजर ध्यानचंद के लिए भारत रत्न की मांग का मर्म यही है। हम ध्यानचंद के साथ-साथ हॉकी को भी भारत रत्न से सुशोभित करना चाहते हैं। हमारा मानना है कि क्रिकेट के साथ-साथ हमें अपने हॉकी के मूल कौशल को भी गौरवान्वित करना होगा।

प्रधानमंत्री जी, अमर उजाला का मजबूत विश्वास है कि ध्यानचंद जैसी हस्तियां किसी भी अवार्ड या सम्मान से ऊपर होती हैं। दद्दा को पद्मभूषण तो उनके जीवित रहते मिल ही गया था। लेकिन भारत रत्न का अलंकरण ध्यानचंद जी के परिवार और उनके लाखों-करोड़ों प्रेमियों को नया हौसला देगा। वह लाखों नए खिलाड़ियों के लिए प्रेरणापुंज बनेगा कि वे आगे बढ़ें और इस खेल में अपना करियर देखें। इससे भारतीय हॉकी के जख्मों पर मरहम लगेगा। इससे हॉकी प्रेमियों का पराजय भाव घटेगा। देश-विदेश में संदेश जाएगा कि क्रिकेट के सचिन को जीते जी भारत रत्न देने जैसा अच्छा काम करने वाली भारत सरकार हॉकी के भगवानों को कम से कम मरने के बाद तो अपना सर्वोच्च सम्मान दे ही रही है।

प्रधानमंत्री जी, एक बार फिर अमर उजाला के विराट पाठक परिवार की ओर से हम आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि बाबू ध्यानचंद के जन्मदिन पर हमने जो पवित्र संकल्प लिया है उसमें अपना आशीर्वाद दें और बाबूजी को भारत रत्न देने का पुनीत निर्णय लें। हमारे इस अभियान में अपना सहयोग दें। अमर उजाला परिवार और देश के करोड़ो खेलप्रेमी आपके आभारी होंगे।

सादर 
अमर उजाला समूह

 

Major Dhyanchand is the Don Bradman of Hockey - the greatest sportsperson India has ever produced. He is also a son of the soil whose success showed the way to thousands of young from the Hindi hinterland in particular and the country in general. The overlooking of Major Dhyanchand for Bharat Ratna even 70 years after independence is inexplicable - and will slowly dim the sheen and the narrative of this great man in the collective consciousness of our regions. If he is bestowed and honoured with Bharat Ratna, it will spark an immediate and widespread interest in the nation for the dying sport in India. More importantly, it will create a longstanding impact on the future of Hockey's popularity as our National sport and instil a sense of pride in the young that hail from the ignored regions that Dhyanchand hailed from. 


 

 

 

 

 

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  • Amar Ujala
    Goverment of India


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