आचार्यकुलम् शिक्षा संस्थानम् संबंधी कुछ सुझाव / अनुरोध

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।। ओम् ।।

दिनांक –  27/11/2018               

सेवा में,

 निदेशक महोदय एवं प्राचार्य महोदया,                                                                     आचार्यकुलम् शिक्षण संस्‍थानम्, पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

माननीय महोदय / महोदया,

सादर प्रणाम, 

आचार्यकुलम् शिक्षा संस्‍थानम् संबंधी कुछ सुझाव / अनुरोध

  •  परमपूज्‍य स्‍वामीजी और श्रद्धेय आचार्यजी के मार्गदर्शन में पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार के आचार्यकुलम् शिक्षण संस्‍थान में अध्‍ययनरत बालक/बालिकाओं के अभिभावक होने का हमें बहुत गर्व है। हम अभिभावक पहले भी रचनात्‍मक और उपयोगी सुझाव एवं अनुरोध करते रहे हैं, जिन पर आपकी ओर से सकारात्‍मक कार्रवाई भी की गई है। इसके लिए हम आपका आभार व्‍यक्‍त करते हैं।
  •  अभी आचार्यकुलम् का नवीन परिसर में स्‍थानांतरण होने के बाद स्थितियों में बहुत-से अच्‍छे सकारात्‍मक परिवर्तन हुए हैं। नया परिसर काफ़ी बड़ा तो है ही, साथ ही इसमें बहुत-सी ऐसी सुविधाएँ और व्‍यवस्‍थाएँ बच्‍चों को मिलेंगी, जो उनके शैक्षणिक स्‍तर एवं व्‍यक्तित्‍व विकास में सहायक होंगी। हम अभिभावक आचार्यकुलम् को और अधिक अच्‍छा बनाने के उद्देश्‍य से आपस में विचारविमर्श करते रहते हैं। इस विचारविमर्श के बाद हम यहाँ तीन खंडों में कुल 35 सुझाव / अनुरोध हम आपके समक्ष विचारार्थ प्रस्‍तुत कर रहे हैं:-

खंड (1) - बच्‍चों की शिक्षा-व्‍यवस्‍था व स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी सुझाव / अनुरोध -

 (1)   बच्‍चों को ध्‍यान (मेडिटेशन) का विशेष अभ्‍यास करवाया जाना चाहिए। बच्‍चे योग करते हैं, प्राणायाम करते हैं लेकिन उन्‍हें ध्‍यान की विभिन्‍न पद्धतियों का कम अभ्‍यास करवाया जाता है। अनुरोध है कि बच्‍चों को ध्‍यान (मेडिटेशन) की (मध्‍य-मस्तिष्‍क/मिड-ब्रेन डेवलपमेंट सहित) अन्‍य सभी विधियों का नियमित रूप से अभ्‍यास कराया जाए ताकि बच्‍चों की एकाग्रता, स्‍मरणशक्ति, सात्विकता में वृद्धि हो और उनके व्‍यक्तित्‍व में और अधिक निखार आ सके।  

(2)   स्‍वर्णामृत प्राशनम् – अनुरोध है कि पतंजलि योगपीठ द्वारा किए जाने वाले स्‍वर्णामृत प्राशनम् (आयुर्वेदिक रोग प्रतिरक्षण विधि) का लाभ आचार्यकुलम् के बच्‍चों को उपलब्‍ध कराने का कष्‍ट करें। इस वर्ष संभवत: यह कार्यक्रम दि.28/11/2018 को होने वाला है।

(3)   गणित और विज्ञान में कमजोरी - देखा गया है कि अधिकतर बच्‍चे गणित और विज्ञान में कमजोर हैं। इस संबंध में, विशेष प्रयास किए जाने की आवश्‍यकता है। इन विषयों को रोचक व मनोवैज्ञानिक तरीकों से पढ़ाने की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए। साथ ही, अचीवर्स इंस्‍टीट्यूट की ओर से जो स्‍पेशल कक्षाएँ ली जाती हैं, वो कक्षा-7 से ही शुरू हो जानी चाहिए, ताकि शुरू से ही इन विषयों पर विशेष ध्‍यान दिया जा सके।

(4)   बच्‍चों से बात करने पर ज्ञात हुआ है कि उन्‍हें संन्यासी दीदियों / संन्यासी भाइयों द्वारा बहुत अच्‍छे तरीके से पढ़ाया जाता है, अच्‍छे से समझाया जाता है। बच्‍चे उनकी कक्षाओं को पसंद कर रहे हैं। अत: आपसे अनुरोध है कि कृपया इस व्‍यवस्‍था को बनाए रखें और आगे बढ़ाएँ।

(5)   श्रीमद्भगवतगीता का अध्ययन कराया जाता है परंतु देखा गया है कि सभी बच्‍चों को यह कंठस्थ ही नहीं है। साथ ही, यह भी अनुरोध है कि इसके अर्थ/भावार्थ सहित अध्‍ययन पर अधिक बल देने का कष्‍ट करें, ताकि बच्‍चों में शुरू से ही जीवन के प्रति समझ विकसित हो सके।

(6)  सत्यार्थप्रकाश के अध्‍ययन का महत्‍व तो सर्वविदित है। हम अभिभावक यह चाहते हैं कि सभी बच्‍चों के पाठ्यक्रम में सत्‍यार्थप्रकाश ग्रंथ को भी शामिल किया जाए ताकि बच्‍चों में वैदिक एवं ऋषि परंपरा के संस्‍कार विकसित हो सकें। पतंजलि योगपीठ में सत्‍यार्थ प्रकाश का अध्‍ययन-अध्‍यापन करने वाले तपस्वियों की कमी नहीं है, उनमें से ही कुछ ऐसे तपस्वी यह महत्‍वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, जो बच्‍चों को सरल भाषा और सरल उदाहरणों से सत्‍यार्थप्रकाश की प्रमुख बातें समझा सकें। अभी जो बच्‍चे कक्षा-9, 10, 11 में हैं और किशोरावस्‍था होने के कारण उनमें शारीरिक, मानसिक और वैचारिक द्वंद्व और संघर्ष की विकासात्‍मक अवस्‍था होती है, उनमें नैतिक मूल्‍यों की स्‍थापना के लिए भी यह रामबाण का कार्य करेगा।

(7)   अंग्रेजी, संस्कृत में वार्तालाप का अभ्‍यास कराने के लिए सुझाव है कि सप्ताह में दो-दो दिन प्रत्‍येक भाषा के लिए निर्धारित कर दिए जाएँ, जैसे- सोम-मंगल को संस्‍कृत में वार्तालाप, बुध-गुरू को अंग्रेजी में वार्तालाप, शुक्र-शनि को हिंदी में वार्तालाप। साथ ही, यह नियम बनाया जाए कि इन दिनों में उस निर्धारित भाषा में ही पूरे विद्यालय में वार्तालाप हो। साथ ही, जो सभी बच्‍चे और शिक्षक, आपस में उसी भाषा में वार्तालाप करें। इससे बच्‍चों को पूरी दिनचर्या के दौरान, तीनों भाषाओं में वार्तालाप का व्‍यावहारिक अभ्‍यास हो सकेगा और उनकी किसी-भी भाषा के प्रयोग संबंधी झिझक दूर हो सकेगी।

बच्चों को विषयवस्तु समझाने के लिए शिक्षक हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समझाते हैं, यह अच्छी बात है। यह भी निवेदन है कि एक बार विषयवस्तु समझने के बाद, उसी विषय को हिंदी/अंग्रेजी दोनों भाषाओं में बच्चे भी अभिव्‍यक्‍त कर सकें, इसका भी अभ्यास बच्चों को नियमित रूप करवाना चाहिए, क्योंकि जब कक्षा में शिक्षक और बच्चे आपस में अंग्रेजी/संस्कृत में वार्तालाप करेंगे, तभी उनका उस भाषा पर सहजता से अधिकार हो सकेगा।

(8)   प्रतिभा खोज अभियान- यह बहुत ही अच्‍छी बात है कि आचार्यकुलम् में बच्‍चों को अपनी प्रतिभाओं को निखारने के बहुत अवसर दिए जाते हैं। आप भी इस बात से सहमत होंगे कि प्रत्‍येक बच्‍चे में कोई-न-कोई प्रतिभा छुपी हुई रहती है। परंतु अधिकतर बच्‍चे अपनी प्रतिभा को समझ न पाने के कारण भ्रमित हो जाते हैं और उनमें झुपी हुई प्रतिभा पर वे ध्‍यान केन्द्रित नहीं कर पाते। यहाँ विद्यालय की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण हो जाती है। अत: हमारा प्रस्‍ताव है कि आचार्यकुलम् में एक ऐसा प्रतिभा खोज अभियान या परियोजना शुरू होनी चाहिए, जिसमें प्रत्‍येक बच्‍चा शामिल हो और आचार्यों / बालमनोवैज्ञानिकों की मदद लेकर, प्रत्‍येक बच्चे में छिपी प्रतिभा को खोजा जाए और फिर उसके अनुसार उसे आगे विकसित किया जा सके।

(9)   एक महिला और एक पुरुष बाल-मनोवैज्ञानिक / परामर्शदाता / काउंसलर की नियुक्ति की आवश्‍यकता -  आचार्यकुलम् में नया प्रवेश लेने वाले बच्‍चे चूँकि कम उम्र में घर-परिवार से दूर होते हैं, जिसके कारण वे उदासी (डिप्रेशन), नैराश्‍य (फ्रस्‍ट्रेशन), तनाव (टेंशन) और घर-की-अति याद (होम-सिकनेस), भय और अकेलेपन का सामना करते हैं। वैसे तो आचार्यकुलम् में योग-प्राणायाम आदि के माध्‍यम से इस पर नियंत्रण किया जाता है परंतु आरंभ के 6 से 8 महीनों तक बच्‍चों को अलग-से आत्‍मीय और मनोवैज्ञानिक परामर्श की भी अधिक आवश्‍यकता होती है। क्‍योंकि इन मनोवैज्ञानिक समस्‍याओं के कारण बच्‍चों में भूख न लगना, वज़न घटना, पढ़ाई में मन न लगना जैसी समस्याएँ पैदा हो जाती है। अत: अनुरोध है कि आचार्यकुलम् में एक महिला और एक पुरुष बाल-मनोवैज्ञानिक / परामर्शदाता / काउंसलर की तैनाती करने का कष्‍ट करें, जो नए छोटे बच्‍चों को होम-सिकनेस, अकेलेपन, उदासी संबंधी समस्‍याओं के लिए और बड़े बच्‍चों को किशोरावस्‍था संबंधी समस्‍याओं के लिए बाल मनोविज्ञान और विकासात्‍मक मनोविज्ञान की प्रविधियों को अपना कर मार्गदर्शन और परामर्श दे सकें।

(10)   बालिका वर्ग में दादी-नानी सदृश वरिष्‍ठ महिलाओं की नियुक्ति (दीदियों के अलावा)-   बालकों के वर्ग में, जिस प्रकार वरिष्‍ठ दादाजी की व्‍यवस्‍था की गई है, जो बालकों का सभी प्रकार से ध्‍यान रखते हैं, उसी प्रकार, बालिका-वर्ग में भी, पहले से तैनात दीदियों के साथ-साथ, दादी-नानी सदृश वरिष्‍ठ महिलाओं की नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि बालिकाओं को भी संस्‍कारजन्‍य मार्गदर्शन प्राप्‍त हो सके और अनुशासन भी बना रहे। 

(11)   बच्‍चों में नैतिक मूल्‍य विकसित करने के लिए हवन के बाद (या किसी भी उपयुक्‍त समय पर) पंचतंत्र, हितोपदेश आदि से प्रेरणादायक कहानियाँ सुनाई जानी चाहिए। इसमें ऐसा भी किया जा सकता है कि बच्‍चे ही तैयारी करके आएँ और छोटी-छोटी कहानियाँ सुनाएँ। कहानी सुनाने के बाद उससे मिलने वाली शिक्षाओं पर चर्चा भी हो। 

(12)   बच्चों को नियमित रूप से तीनों भाषाओं में बारी-बारी से अपने अभिभावकों / भाईबहनों / मित्रों के लिए पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इससे दो लाभ होंगे, प्रथमत: बच्चे अपने अनुभवों को पत्र में अभिव्यक्त करके मानसिक रूप से अच्छा महसूस करेंगे और दूसरे, तीनों भाषाओं में उनकी अभिव्यक्ति क्षमता (एक्सप्रेशन पावर) का विकास हो सकेगा। इस तरह का प्रयोग कई आवासीय विद्यालयों में किया जाता है।

(13)   पूरे परिसर में सात्विक और सकारात्‍मक परिवेश को और अधिक दृढ करने संबंधी– आचार्यकुलम् का पूरा परिवेश सात्विकता और राष्‍ट्रप्रेम की भावना से ओतप्रोत है। इसे और अधिक सुदृढ़ करने के प्रयोजन से निवेदन है कि बच्‍चों के पूरी दिनचर्या के दौरान, जो बीच के अंतराल होते हैं, या कह सकते हैं जिस समय बच्‍चे कुछ वैचारिक कार्य नहीं कर रहे होते, या जिस समय बच्‍चे अपनी दिनचर्या के नियमित/रुटीन के कार्य कर रहे होते हैं, उस समय पूरे परिसर में भजन, राष्‍ट्रभक्ति गीत, स्‍वामी जी द्वारा गए गीत, ओंकार, गायत्री मंत्र आदि को पृष्‍ठभूमि संगीत (बैकग्राउंड म्‍यूजिक) के रूप में चलाया जाना चाहिए। अभी नवीन परिसर में तो छात्रावास के सभी कमरों में स्पीकर सिस्टम लगे हुए हैं, उनका उपयोग करके सुबह ओंकार या गायत्री मंत्र सुनाया जा सकता है। इसी प्रकार,  खेल के समय मैदान में यदि हल्की आवाज में इस तरह से सात्विक एवं राष्ट्रभक्ति पूर्ण संगीत लहरियाँ प्रवाहित होंगी तो उससे अच्छा प्रेरक परिवेश निर्मित होगा और अनौपचारिक व अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों एवं सभी स्टाफ के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।  

(14)    वर्तमान युग में समस्‍त कार्य कंप्‍यूटरों से होता है और भावी युग रोबोट का होने वाला है। रोबोटिक्‍स एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें बच्‍चों को प्रशिक्षित करने की अपार संभावनाएँ हैं। वर्तमान में, कई ऐसी वैज्ञानिक संस्‍थाएँ हैं, जो बच्‍चों में, रोबोटिक्‍स को एक शौक / हॉबी के रूप में विकसित करने के लिए काम कर रही हैं और विभिन्‍न क्षेत्रीय, राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिताएँ आयोजित कर रही हैं। सुझाव है कि ऐसी ही किसी श्रेष्‍ठ वैज्ञानिक संस्‍था से अनुबंध / टाई-अप करके, आचार्यकुलम् के छात्र-छात्राओं के लिए भी रोबोटिक्‍स का प्रशिक्षण एक हॉबी के रूप में प्रारम्‍भ किया जाए ताकि हमारे बच्‍चे भी किसी तरह से पीछे न रहें।

(15)     कंप्‍यूटर पर हिंदी व संस्‍कृत में कार्य करने का प्रशिक्षण- परम पूज्‍य स्‍वामी जी और श्रद्धेय आचार्य जी भी संस्‍कृत और भारतीय भाषाओं में कंप्‍यूटर/आईटी का विकास देखना चाहते हैं। आचार्यकुलम् में कंप्‍यूटर/आईटी भी एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है, जो कि बहुत ही उपयोगी और अनिवार्य है। इसमें विशेष प्रशिक्षण जोड़ा जाना चाहिए, जिससे बच्‍चे कंप्‍यूटर/आईटी का उपयोग अंग्रेजी के साथ-साथ, हिंदी व संस्‍कृत मेें करना भी सीख सकें। आज यूनिकोड के माध्‍यम से कंप्‍यूटर/आईटी के सभी क्षेत्रों में भारतीय भाषाओं में काम कर किया जा सकता है। अत: अपनी भारतीय भाषाओं में कंप्‍यूटर/आईटी का उपयोग कैसे किया जाए, इसका विधिवत् और औपचारिक प्रशिक्षण भी बच्‍चों को दिया जाना चाहिए। आज शायद ही किसी विद्यालय में यह होता होगा, यदि यह आचार्यकुलम् में शुरू किया जाएगा तो इससे आचार्यकुलम् की इस क्षेत्र में भी विशिष्‍ट पहचान स्‍थापित होगी।

खंड (2) - प्रशासनिक / अनुशासनिक व्‍यवस्‍थाओं संबंधी कुछ सुझाव / अनुरोध-

(16)    नवीन परिसर में स्‍थानांतरण की व्‍यस्‍तताओं व अन्‍य कारणों से पिछले काफी समय से सामूहिक पीटीएम नहीं हो पाई है। अनुरोध है कि यथाशीघ्र सामूहिक पीटीएम आयोजित करवाने का कष्‍ट करें। साथ ही, यह भी अनुरोध है कि पीटीएम में परीक्षा की उत्‍तरपुस्तिकाएँ भी दिखाई जानी चाहिए, सभी विषयों के शिक्षक उत्तरपुस्तिकाएँ अपने साथ ले कर पीटीएम में रहें ताकि उत्तरपुस्तिकाएँ देखने के लिए परीक्षा-कक्ष में अलग-से न जाना पड़े। साथ ही, यह भी निवेदन है कि उपलब्धता और समय होने पर पीटीएम में परमपूज्य स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्य का मार्गदर्शन एवं आशीर्वचन प्राप्त करने हेतु उन्हें भी आमंत्रित किया जाना चाहिए।

(17)    बच्‍चों को जो मैडल / शील्‍ड प्रदान की जाती हैं, उन पर प्रतियोगिता / उपलब्धि‍ के साथ, बच्‍चे का नाम, कक्षा और वर्ष भी लिखा जाना चाहिए, ताकि भविष्‍य में उसका रिकॉर्ड रहे।

(18)    फोन पर बात करने की अवधि बढ़ा कर 15 मिनट करने का कष्‍ट करें, ताकि बच्‍चे बिना किसी हड़बड़ी के शांति से बात कर सकें। साथ ही, कई बार मोबाइल पर कनेक्‍शन साफ नहीं रहता और ठीक से बात नहीं हो पाती। इसलिए यदि संभव हो तो लैंड-लाइन से फोन करने की व्‍यवस्‍था करवाने का कष्‍ट करें।

(19)    अनुरोध है कि जहाँ तक संभव हो, बीच सेशन में किसी-भी विषय के शिक्षक न बदले जाएँ। जैसा कि इस वर्ष कक्षा-5(सी) में गणित के शिक्षक को बदलने से बच्‍चों को पढ़ाई में व्‍यवधान हुआ।  

(20)     अनुरोध है कि कक्षा-5 के नए बच्चों को अपना कमरा ठीक रखने व छात्रावास जीवन की सभी बातों का औपचारिक रूप से प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यदि उन्‍हें छात्रावास जीवन का व्‍यवस्थित रूप से औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा तो ज्‍यादा अच्‍छा रहेगा। यदि भैया/दीदी प्रतिदिन 30 मि. निकाल कर 15-15 मिनट दो कमरों को दें और कक्षा-5 के बच्‍चों को कपड़े तह करके अल्‍मारी में सेट करना, बिस्‍तर/चादर सेट करना, व अन्‍य बातें सिखाएँ तो 15 दिन में कक्षा-5 के सभी बच्‍चों को एक बार तो सिखाया ही जा सकता है। यह प्रक्रिया कक्षा-5 के बच्‍चों के लिए वर्ष में दो-तीन बार होनी चाहिए।

(21)    कई बच्‍चों को सिर में इचिंग/जूँ संबंधी समस्‍या है। यह एक ऐसी समस्‍या है जो एक से दूसरे को होती है। जिसे समस्‍या होती है उसका तो ट्रीटमेंट किया जाता है, परंतु तब तक यह किसी दूसरे को हो जाती है और इस प्रकार किसी-न-किसी को बनी ही रहती है अतः अनुरोध है कि एक बार समय निर्धारित करके सभी बच्चों, बच्चियों, दीदियों, भैयाओं व सभी  स्टाफ को जो वहाँ परिसर में रहता है, बडे पैमाने पर, सामूहिक रूप से सभी का एक साथ ट्रीटमेंट करवाया लिया जाए ताकि इस समस्या का समूल उन्मूलन हो सके।

प्रसंगवश, यह भी निवेदन है कि बच्‍चों को स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍या होने पर प्राथमिक रूप से आयुर्वेदिक उपचार हो तथा इमरजेंसी होने पर ही एलोपैथिक दवाएँ दी जाएँ। आशा है अभी बदलते मौसम में मौसमी बुखार आदि से बचाने के लिए बच्‍चों को प्रतिदिन गिलोय का काढा पिलाना आरंभ हो ही गया होगा।

(22)    बच्‍चों के इंप्रेस्ट कैश एकाउंट से हुए खर्च का विवरण तिमाही/मासिक आधार पर ईमेल से भेजा जा सकता है, ताकि अभिभावकों को नियमित रूप से इसकी जानकारी मिलती रहे। 

(23)    आचार्यकुलम् की अपनी वेबसाइट www.acharyakulam.org में विभिन्‍न गतिविधियों की सूचनाएँ उपलब्‍ध कराई जाती हैं। इसे और अधिक उपयोगी बनाने के लिए कुछ अनुरोध -

             i.  वेबसाइट, अभी केवल अंग्रेजी में ही है, यह संस्‍कृत और हिंदी में भी होनी चाहिए।  

            ii.  वेबसाइट पर आचार्यकुलम् में पढ़ने वाले सभी बच्‍चों की कक्षावार फ़ोटो सहित सूची उपलब्‍ध कराई जा सकती है।

            iii.  वेबसाइट को इंटरएक्टिव बनाया जा सकता है, ताकि इसमें प्रत्‍येक छात्र/अभिभावक के लिए लॉगइन आई‍डी बना कर, उसमें बच्‍चे की शैक्षणिक व अन्‍य क्षेत्रों में प्रगति का रिकॉर्ड रखा जा सकता है। साथ ही, उसमें ऑनलाइन संपर्क/सुझाव भी दिया जा सके।

 (24)    इस वर्ष दीपावती की छुट्टियों के संबंध में काफी असमंजस एवं अनिश्चितता की स्थिति निर्मित हुई। अनुरोध है कि विद्यालय जो भी निर्णय ले, उस पर दृढ़ बना रहे तो वह सभी के लिए अच्‍छा रहेगा। अवकाश सरकारी नीति से वर्ष में केवल 2 बार हो और यदि व्‍यक्तिगत कारणों से लेना हो तो वर्ष में अधिकतम 10 दिन निर्धारित किए जा सकते हैं।

 (25)   सुझाव है कि शिक्षकों और अभिभावकों के कक्षावार किम्‍भो एप / हाइक / वॉट्सएप पर ग्रुप बनाए जा सकते हैं, जिसमें उस कक्षा के सभी अभिभावकों के साथ ग्रुप एडमिन के रूप में उस कक्षा के सभी शिक्षक एवं प्राचार्य/निदेशक रहें, जिससे बच्‍चों की पढ़ाई व अन्‍य बातों के संबंध में अभिभावकों एवं शिक्षकों का सीधा संपर्क एवं समन्‍वय हो सकेगा। सभी आवश्‍यक सूचनाएँ आपस में दी जा सकेंगी और आपसी कम्‍युनिकेशन भी बना रहेगा।

 (26)  बड़े बच्‍चों (कक्षा-9,10,11) को स्वावलंबी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें पाक-कला और बागवानी का प्रशिक्षण दिया जाए। अतः बच्चों को दाल, सब्जी, रोटी और प्रमुख नाश्ते बनाना और बागवानी सिखाया जाना चाहिए। सप्ताह में किसी-भी एक दिन ये कार्य करने का अवसर बच्‍चों को दिया जा सकता है।

(27)   बड़े बच्‍चे (कक्षा-9,10,11) जब कंप्यूटर लैब में कार्य कर रहे हों तो उस समय वहाँ वरिष्ठ आचार्य रहना चाहिए जो इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे इंटरनेट की सुविधा का दुरुपयोग न करें। बच्चों की पहुँच किसी भी प्रकार के अनावश्‍यक सोशल मीडिया, फेसबुक, यूट़यूब तक नहीं होनी चाहिए।

खंड (3) - नवीन परिसर की व्‍यवस्‍थाओं संबंधी कुछ सुझाव/अनुरोध

(28)  बच्‍चों को फेज़-1 स्थित नवीन परिसर से फेज़-2 स्थित श्रद्धालयम् / योगभवन तक ले जाने के लिए सुरक्षा की दृष्टि से, हमेशा वाहन व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए। चूँकि पतंजलि योगपीठ में बड़े-बड़े आयोजन फेज़-2 में ही होते हैं और उनमें आचार्यकुलम् के बच्‍चे भी शामिल होते हैं। बच्‍चों को पिछले दिनों कई बार हाईवे से पैदल ले जाया गया, जो हाईवे के भारी/तेज ट्रेफिक एवं सुरक्षा की दृष्टि से ठीक नहीं है। अत: इसके लिए हमेशा वाहन व्‍यवस्‍था करवाने की कृपा करें।

(29)  ज्ञात हुआ है कि बच्‍चों का सुबह 11 बजे का नाश्ता बंद हो गया है। इससे बच्‍चे सुबह 8 बजे के बाद सीधे दोपहर 2 बजे सीधे मध्‍याह्न भोजन करते हैं। यह बहुत लंबा गैप हो जाता है और बच्‍चों ने बताया है कि इस दौरान उन्‍हें भूख भी लगती है। बढ़ते बच्‍चों की दृष्टि से अनुरोध है कि कृपया सुबह 11 बजे का नाश्‍ता पुन: प्रारंभ करने की कृपा करें।

ज्ञात हुआ है कि बच्‍चों को अपने रूम से कैंटीन, कक्षाओं में आनेःजाने में समय बेकार जाता है इसलिए 11  बजे का नाश्ता स्किप किया गया है। इस संबंध में, सुझाव है कि यदि समय बचाना ही प्रयोजन हो तो 11 बजे बच्चों को पैकेट बना कर सूखे मेवे वितरित किए जा सकते हैं, ताकि बच्चे उस समय भूखे न रहें।  इससे एक और लाभ होगा कि कई अभिभावक बच्चों को घर से सूखे मेवे भिजवाते हैं, वे भी नहीं भेजेंगे और बच्चों के खानपान में एकरूपता बनी रहेगी।

(30)   नए परिसर में रोटियाँ मशीन से बनाई जा रही हैं। इसमें शुरू-शुरू में, संभवत: मशीनों का अभ्‍यास न होने के कारण रोटियों की गुणवत्‍ता में कमी आई थी और बच्‍चों को दिक्‍कत हो रही थी। अनुरोध है कि रोटी बनाने वाले भाइयों को मशीन का अधिकतम अभ्‍यास करवाया जाए ताकि मशीन से अच्‍छी रोटी बन सकें।  साथ ही, यह भी अनुरोध है कि यदि कैंटीन के रसोईघर/किचन में भोजन बनाने के लिए एल्‍युमीनियम के बर्तनों का प्रयोग किया जा रहा हो तो उनके स्‍थान पर स्‍टील के बर्तनों का प्रयोग किया जाए।

(31)   टीटी टेबल ना होने संबंधी- नए परिसर में वैसे तो सभी खेलों की उत्‍तम व्‍यवस्‍था करने की योजना है, परंतु इसमें कुछ समय लग रहा है। अत: अनुरोध है कि जब तक नवीन परिसर में योजना के अनुसार खेलों की पूरी व्‍यवस्‍था नहीं हो जाती, तब तक के लिए पुराने परिसर के खेलों के सामान (विशेषकर टेबल टेनिस की टेबलें आदि) को नए परिसर में शिफ्ट करने का कष्‍ट करें ताकि बच्‍चे टीटी वगैरा खेल जारी रख सकें।

(32)    नवीन परिसर में साइकलिंग की व्‍यवस्‍था- साइकलिंग ऐसा खेल है, जिससे बच्‍चों का व्‍यायाम तो होता ही है आगे के वाहनों को सीखने के लिए भी यह संतुलन संबंधी आधार का काम करता है। आपको याद होगा हमने पुराने परिसर में भी साइकलिंग की व्‍यवस्‍था करवाने का अनुरोध किया था, परंतु वहाँ स्‍थान कम होने के कारण नहीं हो पाया था। अब नवीन परिसर में तो यह संभव है अत: अनुरोध है बच्‍चों के लिए साइकलिंग की व्‍यवस्‍था करवाने का कष्‍ट करें। यदि संस्‍थान् की ओर से साइकिलों की व्‍यवस्‍था न हो सकती हो तो अभिभावकों द्वारा भी इसकी व्‍यवस्‍था की जा सकती है, इसके लिए कृपया अनुमति प्रदान करने का कष्‍ट करें।

(33)  नवीन परिसर में छात्रावास के कमरों संबंधी -

               I.   अभी एक कमरे में 6 बच्‍चों के रहने की व्‍यवस्‍था है। इससे बच्‍चों को जगह कम मिल रही है, कमरे बहुत कंजेस्‍टेड हो गए हैं। अलमारियों में सामान रखने की जगह भी कम पड़ रही है। बालिका वर्ग में यह समस्‍या और ज्‍यादा हो रही है क्‍योंकि एक रूम में संख्‍या अधिक होने के कारण सुबह स्‍नान करके तैयार होने में अधिक समय लग रहा है। इस कारण बच्‍चे सुबह आधा-पौन घंटा जल्‍दी उठ रहे हैं, इस कारण नींद पूरी नहीं हो पा रही है और कुल मिला कर इस सब का पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। अत: अनुरोध है कि एक कमरे में 4 बच्‍चों के रहने की व्‍यवस्‍था करवाएँ। बाकी बचे स्‍थान पर बालिका वर्ग में पार्टीशन करके चेंजिंग रूम बनाया जा सकता है, ताकि सभी बालिकाएँ कम समय में स्‍नानादि करके तैयार हो सकें।

                II. इसके साथ ही, गीज़रों का गरम पानी भी जल्‍दी खत्‍म हो जाता है। फिर पानी गरम होने में समय लगता है तो देरी से बचने के लिए कुछ बच्‍चों को ठंडे पानी से नहाना पड़ता है। अत: अनुरोध है कि कृपया सभी बाथरूम में या तो गीज़रों की संख्या बढाएँ या बडी कैपेसिटी के गीज़र लगवाने का कष्ट करें। 

               III.  बच्‍चों के रूम की कई अलमारियों के लॉक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं और कई लॉक एक ही कॉमन चाबी से खुल रहे हैं। कृपया इसका भी यथाशीघ्र समाधान करवाने का कष्ट करें।

              IV.  रूम के बिस्‍तरों की लंबाई कम है, इससे जो बच्‍चे लंबे कद के हैं, उन्‍हें अपने बिस्‍तरों के आगे सूटकेस वगैरा जमा कर एडजस्‍ट करना पड़ रहा है, कृपया इसमें भी उनकी कुछ मदद करें।

(34)  इसके साथ ही, आशा है कि नवीन परिसर में बालक-बालिकाओं के लिए मल्‍टी एक्‍टीविटी हॉल / सभागार व यज्ञशालाएँ बनवाने का कार्य यथाशीघ्र पूरा करवा लिया जाएगा। साथ ही, वर्षा ऋतु के दौरान नवीन परिसर में बच्चों/शिक्षकों को अपने कमरे/आवास से भोजनकक्ष, कक्षा, प्रशासनिक भवन आदि में आते-जाते समय दिक्कत होगी, सभी को छाते रखने पडेंगे। अत प्रस्ताव है कि पूरे परिसर में छात्रावासों / शिक्षकों निवास स्‍थान से भोजनकक्ष, कक्षा एवं प्रशासनिक भवन तक, एक-से-दूसरे स्थान तक पैदल आने-जाने के लिए, शेडेड या कवर्ड कॉरीडोर बनाने पर विचार किया जा सकता है, जिस प्रकार पतंजलि योगपीठ फेज-1 में बने हुए हैं।

(35)   अनुरोध है कि परम पूज्य स्वामी जी एवं श्रद्धेय आचार्य जी के मार्गदर्शन में, आचार्यकुलम् के अभिभावकों के लिए 7 दिवसीय योग एवं संस्कार शिविर का आयोजन करवाने की कृपा करें ताकि पतंजलि योगपीठ की शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्राँतिकारी विचारधारा एवं लक्ष्यों के प्रति, आचार्यकुलम् के सभी अभिभावकों का मानस,  भावभूमि एवं पुरुषार्थ एकाकार हो सके।

हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्‍वास है कि आप हमारे उक्‍त सुझावों और अनुरोधों पर विचार करने का कष्‍ट करेंगे। हम सभी आचार्यकुलम् और उसके बच्‍चों के गौरव और प्रगति के लिए सदैव तत्पर रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उक्‍त सुझावों / अनुरोधों के कार्यान्‍वयन की दिशा में अपेक्षित योगदान के लिए हम अभिभावक भी हमेशा तैयार हैं। आपसे विनम्र अनुरोध है कि उक्‍त सुझावों और अनुरोधों पर विचार करके उपयुक्‍त कार्रवाई करवाने की कृपा करें।

 सादर,

 - विनम्र निवेदक –

 पालक / अभिभावक, आचार्यकुलम् शिक्षा संस्‍थानम् 

दिनांक – 27/11/2018



आज — आचार्यकुलम् अभिभावक पतंजलि परिवार आप पर भरोसा कर रहे हैं

आचार्यकुलम् अभिभावक पतंजलि परिवार Acharyakulam Abhibhawak Patanjali Pariwar से "director@acharyakulam.org: आचार्यकुलम् शिक्षा संस्थानम् संबंधी कुछ सुझाव / अनुरोध" के साथ आपकी सहायता की आवश्यकता है। आचार्यकुलम् अभिभावक पतंजलि परिवार और 135 और समर्थक आज से जुड़ें।