मुजफ्फरपुर के बालिका गृह मामले की न्यायिक जाँच

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मुज़फ्फरपुर, बिहार स्थित बालिका गृह में बच्चियों के साथ बलात्कार, शारीरिक हिंसा और उन्हें वेश्यावृत्ति में धकेलने की ख़बरों से हम सभी स्तब्ध हैं। केंद्र सरकार की 'समेकित बाल संरक्षण योजना' के अंतर्गत यह बालिका गृह स्वयंसेवी संस्था 'सेवा संकल्प एवं विकास समिति' द्वारा संचालित की जा रही थी। बालिका गृह के संचालन के लिए आवश्यक अनुदान में 60% केंद्र सरकार, 30% राज्य सरकार और 10% स्वयंसेवी संस्था द्वारा दिया जाता है। समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार के द्वारा बेसहारा, अनाथ, मानव व्यापार और बाल मजदूरी से छुड़ाए गए लड़के-लड़कियों के लिए ये बाल/बालिका गृह अलग-अलग जिलों में NGOs के माध्यम से चलाए जा रहे हैं जिसका चयन भी विभाग ही करती है।

बालिका गृहों में 6 से 18 वर्ष तक के लड़कियों को रखा जाता है और यहाँ इनकी देखभाल, शिक्षा, घर ढूंढा जाना, प्रशिक्षण करवाना आदि कार्यक्रम कराए जाने का नियम है। इन गृहों के त्रैमासिक अवधि में निरीक्षण के लिए जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला निरीक्षण समिति का भी गठन किया गया है। इसके अलावा जिला बाल संरक्षण इकाई (समेकित बाल संरक्षण योजना के अंतर्गत जिले में संचालित विभिन्न कार्यक्रमों जिसमे गृह भी शामिल हैं, उनके समुचित कार्यान्वयन और मॉनिटरिंग के लिये जिला स्तर पर गठित नोडल बॉडी) के नोडल ऑफिसर सहायक निदेशक, बाल संरक्षण इकाई की अध्यक्षता में प्रत्येक गृह के अंदर एक प्रबंधन समिति का गठन हुआ है। यह प्रबंधन समिति महीने में एक बार बैठक करेगी और गृह प्रबंधन तथा बच्चों की समस्याओं पर विचार करेगी। इस समिति में दो बाल-सदस्यों को भी नामित किये जाने का प्रावधान है। इतना ही नहीं, Juvenile Justice Act, 2015 के अन्तर्गत प्रत्येक जिले में प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्ति प्राप्त एक पाँच-सदस्यीय बाल कल्याण समिति का भी गठन किया गया है जो इन गृहों के अन्दर बैठक कर बच्चों के संबंध में ज़रूरी आदेश पारित करती है। बाल कल्याण समिति को इन गृहों का महीने में कम से कम दो बार इंस्पेक्शन विज़िट करना है।

इतने सुरक्षात्मक प्रावधानों के बावज़ूद मुज़फ्फरपुर बालिका गृह में बच्चियों के साथ वर्षों से यौन शोषण और देह व्यापार की घटनाएं घटना पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। शायद ये मामले प्रकाश में आते भी नहीं यदि समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार ने टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ की 'कोशिश' टीम के द्वारा राज्य में स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से चल रहे ऐसे सभी गृहों का सामाजिक अंकेक्षण (social audit) नहीं कराया होता। 'कोशिश' द्वारा सौंपे गए रिपोर्ट में पहली बार मुज़्ज़फरपुर में बच्चियों के साथ यौन शोषण की घटना सामने आयी। 26 मई को इस रिपोर्ट को विभाग ने अपने अधिकारियों के बीच कार्रवाई के लिए साझा किया। 28 मई को सहायक निदेशक, जिला बाल संरक्षण इकाई, मुज़्ज़फरपुर के द्वारा महिला थाने में POCSO Act और IPC के तहत मामला दर्ज करते हुए पहले सभी बच्चियों को अलग-अलग गृहों में भेजा गया। फ़िर 30 मई को जिला पुलिस द्वारा कार्रवाई करते हुए संस्था के Chief Functionary ब्रजेश ठाकुर और महिला कर्मियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। 20 जून को पुलिस ने अभियुक्तों को रिमांड पर लेने की अर्जी दी है। यह सब पढ़ने से ऐसा लगेगा कि मामला प्रकाश में आने के बाद सरकार गम्भीर है और कार्रवाई कर रही है। पर ऐसा है नहीं। यदि ऐसा होता तो बच्चियों का मेडिकल जाँच (बलात्कार के मामले में अनिवार्य) और मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान (धारा 164, CrPC) पूरे होने में 20 दिन का लम्बा वक़्त नहीं लगता।

समाज कल्याण, पुलिस, अभियोजन और स्वास्थ्य विभाग के बीच कहीं तालमेल ही नहीं है। बच्चियाँ पटना बुलाई जाती हैं मेडिकल एग्जामिनेशन के लिए और यहाँ उन्हें तीन दिनों तक इंतज़ार करना पड़ता है। मामले को ठंढे बस्ते में डालने का भी 'प्रयास' किया जा रहा है। बच्चियों ने इस मामले में जाँच अधिकारी ज्योति कुमारी द्वारा धमकाए जाने की भी बात कही है। एक बच्ची ने तो यहाँ तक बताया कि मजिस्ट्रेट के सामने बयान देने जाने के पहले उक्त जाँच अधिकारी ने लड़की को धमकाया कि अग़र उसने पूरी बात बतायी तो उसे वापसी के रास्ते में चलती बस से धकेल दिया जाएगा। बच्चियों से बात के दौरान वहशियाना कृत्य सामने आए हैं। बच्चियों को कीड़े मारने वाली दवा खिलाने के नाम पर उन्हें बेहोशी की दवा खिलाई जाती थी और रात में उनके साथ बलात्कार किया जाता था।

ब्रजेश ठाकुर, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई के अधिकारी सभी मिल कर लड़कियों का बलात्कार करते थे। ब्रजेश ठाकुर मुज़फ्फरपुर में 'प्रातः कमल' के नाम से एक दैनिक अखबार भी चलाता है और उसका मुख्य संपादक भी है। साथ ही जिला प्रशासन और सरकारी विभागों में ऊँची पहुँच रखता है। इसी रसूख के बल पर यह समाज कल्याण विभाग की कई योजनाएं चलाता रहा है। लड़कियों के लिए बालिका गृह, परित्यक्त और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए स्वाधार गृह, अल्पावास गृह, रेडलाइट इलाकों की बच्चियों के लिए खुला आश्रय ये सब इसको समाज कल्याण विभाग ने नवाज़े थे। इसके आड़ में यह सफेदपोश जिस्मफरोशी का धंधा करवाता था।

बच्चियों ने बताया कि बाहर से मर्दों को बुलाया जाता था और उनके सामने लड़कियों को भेजा जाता था। होटलों में तंग और छोटे कपड़े पहनकर डांस करवाने पर मजबूर किया जाता था। मना करने पर रॉड से, लात और घूँसे से मारा जाता था। सिगरेट से जलाए जाने की बात भी सामने आयी है। गृह की एक महिला स्टाफ भी बच्चियों का यौन शोषण करती थी। बच्चियों को मोबाइल पर अश्लील फिल्में दिखलाई जाती थी। बाल कल्याण समिति के सदस्य हर मंगलवार को गृह में बैठक करते थे और उस दिन वे बच्चियों के साथ ब्लात्कार करते थे। 8 से 10 साल तक की बच्चियों को भी नहीं छोड़ा गया। क्रूरता का इतना घिनौना, व्यापक और संगठित रूप इसके पहले कभी नहीं सुना गया होगा। राज्य पुलिस (CID द्वारा गठित SIT) की वरिष्ठ अधिकारी अनुसुइया रणसिंह साहू, एसपी (कमज़ोर वर्ग) का कहना है कि उनके पास बच्चियों के यौन शोषण के अभी तक कोई सबूत ही नहीं मिले हैं। उनका कहना है कि केस डायरी, पुलिस के सामने (S. 161) और मजिस्ट्रेट के सामने (S. 164) दर्ज़ बच्चियों के बयान और मेडिकल examination में यौन शोषण किये जाने की बात नहीं आयी है। जबकि मुज़फ्फरपुर SSP हरजोत कौर के हवाले से अखबारों में कहा जा रहा है कि बच्चियों ने बलात्कार किये जाने की बात कही है। यह विरोधाभास कहीं ना कहीं मामले पर पर्दा डालने की एक कोशिश का हिस्सा हो सकता है।

जाँच अधिकारी ज्योति द्वारा बच्चियों को बयान देने से धमकाना भी इसी बड़ी साजिश का हिस्सा लगता है। वर्ष 2013 से अभी तक बच्चियों का बलात्कार होता रहा वो भी इतने बड़े पैमाने पर और किसी को भनक तक नहीं, यह बात गले नहीं उतरती। जो ज़रूरी कार्रवाइयाँ हैं उनमें देरी होना ये सब इस आशंका को और मजबूत करते हैं। संभव है कि इस केस की गहराई से पड़ताल होने पर कई नकाबपोशों के नाम उजागर हों। डर के इस माहौल में कहीं बच्चियों की आवाज़ दब ना जाए। इस मामले का सूत्र इतना बड़ा है कि इसकी न्यायिक जाँच किसी वरिष्ठ न्यायधीश की अध्यक्षता में बनाये न्यायिक जाँच टीम से होनी चाहिए । इसमें उच्चस्थ पदाधिकारियों, पुलिसकर्मियों एवं राजनेताओं के शामिल होने के सशक्त संकेत हैं ऐसे में पुलिस के किसी विभाग द्वारा निष्पक्ष जाँच की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है । ऐसे जघन्य अपराधों की पुनरावृति रोकने और रसूखदारों को सजा दिलाने के साथ बिहार में देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों, किशोरों एवं किशोरियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यह आवश्यक है कि इस मामले की जांच हेतु माननीय मुख्यमंत्री, बिहार सरकार से न्यायिक जाँच की मांग की जाये ।



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