Reform in Higher education system in Madhya Pradesh

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मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा संस्थान कुत्सित षड्यंत्रों के अड्डे बनते जा रहे हैं 

आज मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा गर्त में जा चुकी है । और इस अधोपतन के मुख्य कर्णधार अतिथि विद्वानों द्वारा इस आधार पर उनके नियमितीकरण की मांग की जा रही है कि वो सालों से यहां काम कर रहे हैं और यह उनका हक है । तो इसके लिए कुछ तथ्य जानना आवश्यक है

पहला तो यह कि अतिथि विद्वान के लिए नियोजन की पहली ही शर्त यह थी कि यह पूरी तरह से अस्थायी व्यवस्था है और किसी भी स्थिति में स्थायी नियोजन का प्रावधान नहीं करती है। तो जो व्यक्ति यह जॉइन करता है पूर्णतः इन नियम एवं शर्तों से परिचित होता है कि यह स्थायी नियोजन नहीं। फिर वह इस तरह से शासन को ब्लैकमेल कैसे करता है?

दूसरी बात वो कहते हैं कि हम परीक्षा नहीं देंगे और सीधे नियमितीकरण लेंगे जो कि पूर्णतः नियम विरुद्ध है। इनके परीक्षा से डरने का कारण स्वाभाविक है जैसा कि देखा गया असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए आयोजित परीक्षा में ऐसे अधिकांश धुरंधर 20 प्रतिशत अंक लाने तक मे असफल सिद्ध हुए । आत्मावलोकन के बजाय अब ये परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं

इन तथाकथित विद्वानों का नेतृत्व कुछ अत्यंत निकृष्ट मानसिकता के शिक्षक कर रहें  हैं जिन्हें शिक्षक कहना भी इस पद की गरिमा को नष्ट करने वाला है, जो किसी भी हद तक गिरकर संवैधानिक संस्थाओं पर लांछन लगाकर अपना हित साधन करना चाह रहे

क्या इन लोगों की आजीविका की सुरक्षा के लिए प्रदेश के युवाओं का भविष्य दांव पर लगाया जा सकता है??

उच्च शिक्षा विभाग विश्वविद्यालय और महाविद्यालय संचालित करता है जिनसे आशा की जाती है कि वह शिक्षण और शोध में नए प्रतिमान स्थापित करेंगे और उत्कृष्ट संस्थानों के रूप में देश मे अपना स्थान बनाएंगे, न कि ऐसे मानसिक रूप से बीमार और कुंठित मनोवृत्ति के लोगों के अनाचार का अड्डा बनेंगे जिसे वे केवल खैरात का भोजनालय समझते हैं ।

क्या बच्चों और उनके मां बाप पालकों का यह हक नहीं कि वह सरकार से सवाल पूछ सकें कि आखिर क्यूँ उनके बच्चों को ऐसे निकृष्ट किस्म के शिक्षकों के हवाले कर दिया गया है जिनका शिक्षा से दूर दूर तक लेना देना नहीं, उल्टा इनके संपर्क में आकर बच्चे इन्हीं की तरह असामाजिक और कुंठित बनाया जा रहे हैं। क्या अगर माँ बाप गरीब हैं तो शासकीय संस्थाओं में उनके बच्चों को यह अनाचार झेलना ही पड़ेगा?

आखिर कब तक मध्यप्रदेश के छात्र जो साधन संपन्न नहीं हैं, और जिनकी उच्च शिक्षा की एक मात्र आशा शासकीय महाविद्यालयों पर टिकी है ऐसे ही शिक्षकों के भरोसे अपने भविष्य को अंधकार पूर्ण होते देखेंगे?

सरकार के साथ साथ देश भर के जनसामान्य को इस बात की जानकारी होना आवश्यक है कि कैसे अतिथि विद्वानों के नाम वाला एक छुटभैये नेताओं का गिरोह इस प्रदेश की उच्च शिक्षा के साथ सतत खिलवाड़ किये जा रहा है। 

#सब कुछ सहेंगे? आखिर कब तक चुप रहेंगे?