संघर्ष पूर्ण साँसे

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प्रकृति में स्वच्छ वातावरण, स्वच्छ वायु, स्वच्छ पानी, जीवन की अधारभूत इकाई है।
यहाँ रहने वाले प्रत्येक पशु, पक्षी, जीव, कीट, वृक्ष मनुष्य आदि के लिए स्वच्छ वातावरण, स्वच्छ वायु , स्वच्छ पानी जन्माधिकार हैं।

परन्तु मनुष्य ने अपने लालच के कारण , अपनी जेब के कारण प्रकृति का निर्भीक होकर दोहन एवं शोषण किया है। जिससे समूची सृष्टि ही असंतुलित हो चुकी है, और अनेक प्रकार के प्रदूषण से सुसजित है। इसलिए स्वच्छता को बनाये रखने के लिए मनुष्य ही उत्तरदायी है।

एक ओर तो मनुष्य गुरूद्वारे, मंदिर,  मस्ज़िद, चर्च आदि जाता है। परन्तु दूसरी ओर, परमात्मा की ओर से उसे जो स्वच्छ प्रकृति एवं शरीर मिला है, उसका निरादर कर रहा है।

इस समय जगत वायु प्रदूषण से जूझ रहा है। लोग कहते  हैं दीपावली पर पटाखे जलाने हैं, शगुन करना है , धुप अगरबत्ती जलानी है। किस धार्मिक ग्रंथ में लिखा है कि पटाखे जलाने चाहिए? ऐसा करने से तो आता हुआ परमात्मा भी भाग ही जाएगा।
 
यह शरीर जिसके कारण मनुष्य संसार और धर्म भोग रहा है, यह सब प्रकृति की ही देन है। कम से कम  अपने शरीर का आदर करते हुए उसकी स्वछता का ध्यान रखना चाहिए।

सभी लोग सरकार पर , किसानो पर एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं पर कोई अपने को जिम्मेदार मान कर  जागरूक हो तो निश्चित ही इस वायु प्रदूषण से बचा जा सकता है।

सरकार जो भी प्रयास कर रही है उसमे अभी भी कुछ कमियां दिखाई देता है। निम्न लिखित कुछ सुझाव हैं जिनपर तुरंत कार्यरत होने की आवश्यकता है।

  1. केवल बम पटाखे जलाने पर ही नहीं बल्कि बनाने पर ही प्रतिबंध होना चाहिए। 
  2. कोई ऐसा सरकारी विभाग बनाना चाहिए जो सर्दियों में स्थान-स्थान पर जाकर यह निरिक्षण करें कि कहीं लकडियां या कोई अन्य प्रदार्थ तो नहीं जलाया जा रहा।
  3. एक टोल फ्री नंबर भी प्रस्तारित होना चाहिए जिस पर कहीं पर भी आग जलाने सम्बंधित शिकयत दर्ज़ हो और तुरत कार्यवाही हो। 
  4. पराली निकालने के लिए सरकार द्वारा  Happy  seeder मशीन को भी प्रोत्साहित किया जाए । इससे न केवल वायु प्रदूषण की निवृत्ति होगी बल्कि खेत भी उपजाऊ होंगे।

सरकार के द्वारा विकास के नाम पर विनाश हो रहा है। प्रचुर मात्रा में पेड़ों के कटाव से वायु की गुणवत्ता ख़राब हो चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब इस धरती पर बीमारियां ही बीमारियां रह जायेंगी।
अब समय है जागरुक होकर प्रकृति के प्रति अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाने का, न कि राजनीति की आड में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने का।