हृदय रोगियों की लडा़ई

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हृदय रोगियों को लगाया जाने वाला स्टेंट आजकल चर्चा में है। सरकार ने इसके रेट तय कर दिए हैं। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइस अथारिटी (एनपीपीए) कह रही है कि स्टेंट पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं दें। यानी मरीजों और परिजनों को ही सलाह दी जा रही है। अस्पताल वालों को सरकार कुछ नहीं बोल रही। कई अस्पतालों में स्टेंट छुपा लिए गए हैं। अस्पताल मालिक रेट कम किए जाने से खफा हैं क्योंकि उन्हें अनाप-शनाप मुनाफा कमाने से रोका जा रहा है। डाक्टरी पेशे में व्यावसायिकता हावी हो चुकी है। तभी तो मंडीदीप से 200 रुपए में बनकर अमेरिका जाने वाला स्टेंट वहां से मेडिकेटेड होकर भारत में 75 हजार से ढाई लाख रुपए तक में बेचा जा रहा है। एंजियोग्राफी के बाद खुले पडे़ दिल में स्टेंट लगाने के लिए जब डाक्टर दो-ढाई लाख रुपए की मांग करते हैं तब कौन परिजन होगा जो डाक्टरों से रेट कम करने की गुहार लगा सके। धमकी यह कि मरीज की जान खतरे में है, तत्काल पैसे जमा कराओ। दिल के इलाज वाले अस्पतालों में ऐसे दृश्य आम हैं। अस्पताल संचालक और डाक्टर अपने मुनाफे के चक्कर में मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। सरकार क्यों नहीं स्टेंट का कारोबार अपने हाथ में ले ले। प्राइवेट अस्पतालों को भी सरकार ही स्टेंट सप्लाई करे। स्टेंट लगाने की प्रक्रिया भी अल्ट्रा सोनोग्राफी की तरह सरकार की निगरानी में रखी जाए। सारे हार्ट हास्पिटल एक सेंट्रल सर्वर से जोड़ दिए जाएं ताकि सरकारी अफसर उन पर निगाह रख सके। यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या मरीज को जबरन स्टेंट तो नहीं लगाए जा रहे हैं। बिना स्टेंट के भी ब्लाकेज निकाले जा सकते हैं लेकिन मोटी कमाई के लालच में भी जबरन स्टेंट लगाए जा रहे हैं। पूरे मेडिकल पेशे में ही लूटमार मची है तभी तो डाक्टर बनने के लिए दो-दो करोड़ रुपए तक की रिश्वत दी जा रही है। हृदय रोगियों के साथ होने वाली लूट बंद कराने के लिए यह याचिका सरकार तक पहुंचाई जा रही है ताकि अस्पतालों की मनमानी पर अंकुश लगाया जा सके। -भगवान उपाध्याय



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