शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य न लिए जाएं

0 व्यक्ति ने हसताकषर गये। 100 हसताकषर जुटाएं!


भारतवर्ष क्या पूरे विश्व में प्राथमिक शिक्षा व्यक्ति के जीवन का आधार समझी जाती है। किसी भी ढांचे को खड़ा करने के लिए उसकी नीवं को मजबूत किया जाना अतिआवश्यक है। यदि नीवं ही मजबूत नही होगी तो किसी भी ढांचे का अधिक समय तक टिके रह पाना संभव नहीं। उसी प्रकार प्राथमिक शिक्षा बालक के शेष जीवन का आधार होती है। बालक वयस्क होकर किस जीवन शैली में विचरित करेगा या उसका भावी जीवन कैसा होगा, यह उसकी शिक्षा पर ही निर्भर करता है। उच्च शिक्षा के गूढ़ ज्ञान को समझने के लिये प्राथमिक शिक्षा में सीखी गई वर्णमाला एवम गिनती ही सहायक होगी। यह कभी भी संभव नहीं है कि सुबोपली को सीखे बिना फ्रांसिस बेकन की ऑफ स्टडीज को समझा जा सके या फिर बिना शून्य के ज्ञान के आर्किमिडीज़ का सिद्धांत समझ मे आ जाये।

किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में प्राथमिक शिक्षा के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है वह बेहद चिंता का विषय है। एक तरफ तो आर टी ई एक्ट के माध्यम से शिक्षा में सुधार के तमाम प्रयासों की रूपरेखा तैयार की गई है किंतु धरातल पर कुछ और ही चल रहा है। खासतौर से उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्कूलों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। एक तरफ तो इन स्कूलों में डेढ़ लाख से अधिक सहायक अध्यापकों के पद खाली हैं वहीं सरकार ने प्राथमिक और जूनियर स्कूलों के संविलियन के नाम पर बहुत सारे प्रधानाध्यापकों के पद ही खत्म कर दिए हैं। एक अध्यापक दो या उससे अधिक का कार्य करने को मजबूर है। सोचिये 60 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण स्कूलों की बागडोर सहायक अध्यापकों के हाथों में है। ऊपर से अध्यापकों से अनेक प्रकार के गैर शैक्षणिक कार्य लिए जा रहे हैं। अध्यापक को रोज सुबह विद्यालय में एम डी एम बनवाने के लिए सब्जी आदि सामान बाजार से लेने जाना होता है। मिड डे मील की पूरी जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक/ प्रभारी प्रधानाध्यापक की ही होती है इसके अतिरिक्त विभाग द्वारा विद्यालय प्रबंध समिति के माध्यम से बच्चों को दिए जाने वाली अनेक सुविधाएं जैसे स्कूल यूनिफार्म, जूते, मोजे, बैग, पुस्तकें इत्यादि की खरीद फरोख्त एवम बांटने की जिम्मेदारी भी अध्यापक की ही है, साथ ही यदि ग्राम प्रधान या विद्यालय प्रबंध समिति के अध्यक्ष द्वारा दखलंदाजी कर गुणवत्ता से समझौता कर लिया जाए तो इसकी भी पूरी जिम्मेदारी अध्यापक की ही है जबकि वित्तीय व्यवस्था में वे दोनों ही अध्यापक से उच्च पद पर आसीन हैं तथा किसी भी अनियमितता की स्थिति में कार्यवाही केवल अध्यापक पर ही होती है जैसा कि हाल ही की घटना में हुआ है जिसमें कि एक विद्यालय के छात्रों को मिड डे मील में रोटी के साथ नमक परोसने की घटना होने पर विद्यालय के अध्यापक को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया जबकि ग्राम प्रधान को केवल कारण बताओ नोटिस ही जारी किया गया है। ग्रामीण स्तर पर संचालित की जाने वाली अनेक योजनाओं में अध्यापक का ही सहारा लिया जाता है चाहे ग्रामीणों को स्वास्थ्य विभाग द्वारा दिया जाने वाला टीकाकरण हो या बच्चों एवम गर्भवती स्त्रियों को आयरन एवम कैल्शियम की गोली बाँटनी हो, यहाँ तक कि पेट के कीड़ों की एल्बेंडाजोल की गोली भी अध्यापक को ही बाँटनी होती है। इसके अतिरिक्त जनगणना, बालगणना, आर्थिक सर्वेक्षण, चुनावी कार्य, मतगणना आदि न जाने कितने सरकारी कार्य अध्यापकों को ही करने होते हैं। इन सब कार्यों के पीछे शिक्षा जैसे गौण हो गई है। सोचिए अगर अध्यापक दिनभर अन्य सरकारी कार्यों में ही व्यस्त रहेगा तो शिक्षण कार्य कब करेगा। आज राजकीय विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता के स्तर के निम्न होने के पीछे सबसे बड़ा कारण शिक्षक द्वारा गैर शैक्षणिक कार्यों में लगे रहना ही है। शिक्षक अन्य कार्यों के भार तले इतना दब गया है तथा इनके पूर्ण न हो पाने पर कार्यवाही के डर के कारण वह अपने मूल कार्य से विरत ही रहता है। अतः अब वह समय आ गया है कि शिक्षक को केवल शिक्षण करने दिया जाए तथा अन्य कार्यों हेतु कोई और व्यवस्था कर ली जाए। अन्यथा एक दिन हम बहुत पिछड़ जाएंगे और फिर पछताने से कुछ नही होगा।