"मातृभाषा में शिक्षा" का मिले हर भारतीय को अधिकार

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नमस्कार दोस्तों, चुनाव सिर पर है। देश का हर नेता अपने-अपने मुद्दे के साथ मैदान में हैं। कोई हिंदुओं के नाम पर राजनीति कर रहा है,तो कोई अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति कर देश की सत्ता पर काबिज होना चाहता है।जिन मुद्दों से देश का हित हो, उनकी किसीको भी परवाह नहीं है। जैसे-बेरोजगारी, कुपोषण,गरीबी और इन्हीं में से एक मुद्दा है शिक्षा का (मातृभाषा में शिक्षा का)!

आज की जो शिक्षा पद्धति है-वह अंग्रेजों की देन है।

आजादी के इतने वर्षों के बाद भी हम देश को अपनी शिक्षा पद्धति नहीं लौटा पाएं। यह अंग्रेजी शिक्षा पद्धति  हमें सिर्फ शिक्षित होने के सर्टिफिकेट दिला सकती है,इससे ज्यादा कुछ नहीं।

आज इसी का परिणाम है कि देश के सामने बेरोजगारों की फौज खड़ी हुई है, जिनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो है लेकिन उनके अनुकूल ज्ञान की कमी है।

अगर उन्होंने अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण की होती तो स्थिति कुछ और होती। पाठ्यक्रम को रटने की जो लत उनमें अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने लगाई है वो कभी नहीं पनप पातीं। अंग्रेजी का ज्ञान ना होने के कारण  देश के करोड़ों विद्यार्थीयों  को जो आलोचना सहनी पड़ती है, उच्च वर्ग के लोगों का तिरस्कार जो सहना पड़ता है शायद वो कभी ना सहना पड़ता।ना ही देश के किसी विद्यार्थी को अंग्रेजी विषय में असफल हो जाने पर पढाई अधुरी छोड़नी पड़ती। मानसिक तनाव के कारण जो विद्यार्थी आत्महत्याएं कर रहे हैं,वो ना होती।

जितना समय विद्यार्थी किसी दुसरी भाषा को आत्मसात करने में देते हैं उतना और समय अपने अध्ययन को दे पाते,तो जो तरक्की आज चीन की है उससे कहीं ज्यादा मेरे भारत की होती।

अगर आज भी भारत अपनी शिक्षा पद्धति लागू करने में कामयाब हो जाता है और युवाओं को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार मिल गया तो देश की युवा पीढ़ी को देश की तस्वीर और तकदीर बदलने में समय  नहीं लगेगा।

हम शायद इस बात को भुला रहे हैं कि विश्व के सभी विकसित देश अपने सभी कार्य (अपने नागरिकों को शिक्षा तक) उनकी अपनी मातृभाषा में करते हैं- चीन-मंदारिन, जापान-जापानी, इजरायल-हिब्रु और अमेरिका-अमेरिकन इंग्लिश में।

देश के युवाओं पर से मानसिक दबाव को कम करने और देश के विकास में सहयोग के लिए आप सभी का साथ मांगता हूं।