घर में महिलाओं का उत्पीड़न बंद हो

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विश्वभर में आत्महत्या करने वाली प्रति दस महिलाओं में से चार हमारे देश भारत से होती हैं। लैनसेट पब्लिक हेल्थ जनरल में छपे शोध लेख के मुताबिक वर्ष 2016 में विश्वभर में आत्महत्या करनेवाली महिलाओं में 37फीसदी भारतीय थीं।

आत्महत्या करनेवाली महिलाओं में ज्यादातर विवाहित हैं। जबकि भारतीय परिवेश में विवाह को महिलाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। भारतीय मां-बाप अपनी बेटियों की शादी के बाद खुद को चिंतामुक्त मान लेते हैं।

कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों है। आप-अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को देखिए कि क्या घर के अहम फैसले वो खुद ले रही हैं। मेरा मानना है कि ज्यादातर महिलाएं बिना परिवार की मर्जी के कोई कदम नहीं उठाती हैं।

परिवार में बेटियों पर सख्ती करना, बहुओं के साथ भेदभाव भरा बर्ताव बेहद आम है। हमारे पुरुष प्रधान समाज में माना जाता है कि घर के सारे कामकाज की ज़िम्मेदारी महिलाओं की ही होगी। घर के पुरुष सदस्यों का सहयोग नाम मात्र का होता है। ऐसे में घर संभालनेवाली महिलाओं का श्रम बहुत अधिक होता है। वो शिकायत भी नहीं कर पाती। तनाव में रहती है। अपने सपने पूरे करने का समय उसके पास नहीं होता। परिवार के दूसरे सदस्यों की फरमाइश पूरी करना ही उसके खाते में आ जाता है। महिलाओं की ये स्थिति बदलनी चाहिए। वो अपने पति या परिवार की नौकरानी नहीं बल्कि एक समान सदस्य की हैसियत रखती है।

एक उदाहरण- प्रेमा अभी घर के सारे काम निपटा के बैठी ही थी कि घर पर मेहमान आ गए। उसके सास-ससुर जो काफी देर से टीवी देख रहे थे, उन्होंने प्रेमा से चाय बनाने को कहा। वो चाय बना ही रही थी कि ससुर ने चिल्ला कर कहा- कि क्या चाय बनाने में इतना समय लगता है। मेहमानों के सामने उसके ससुर का ये बरताव उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगी। लेकिन वो अपना गुस्सा जज्ब करके रह गई। क्या उसके ससुर स्वंय चाय बना कर मेहमान को नहीं दे सकते थे? चाय बनाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ घर की बहू की ही होती है? वो  भी तब जब वो सुबह से घर के काम में लगी थी और उसके सास-ससुर टीवी देख रहे थे।

ऐसे छोटे-छोटे कई उदाहरण आपको मिल जाएंगे, जो एक महिला के साथ दिन में कई-कई बार होेते हैं। जो उसके आत्मविश्वास को तोड़ते हैं। उसे बार-बार नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। फिर वो महिला समाज के कैसे सर उठाकर अपनी बात पूरे आत्मविश्वास के साथ कह पाती होगी।

पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी उनके अधिकारों का पता नहीं होता। ग्रामीण परिवेश में बुरी स्थिति है। जो महिलाएं इन बातों की समझ रखती हैं, वे भी चुपचाप रह जाती हैं क्योंकि यहां बोलने का मतलब अपने परिवार से ही लड़ना है।

हमारे भारतीय समाज में "सामाजिक सुरक्षा" को लेकर सतर्कता नहीं बरती जाती। महिला सशक्तिकरण के तमाम नारों के बीच भारतीय लड़कियां-महिलाएं स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें परिवार में ही बराबरी का दर्जा और सम्मान नहीं मिलता।

क्या आपको लगता है कि महिलाओं की इस स्थिति में बदलाव आना चाहिए। क्या आप मानते हैं कि महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने में हम नाकामयाब रहे हैं।

ज़िला-राज्य स्तर पर महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा के लिए टीम का गठन हो। कोई महिला शिकायत करने आए, ये जरूरी नहीं है। ये टीम समय समय पर अभियान चलाकर खुद परिवार में पुरुषों और महिलाओं से बात करे। महिलाओं को एक हेल्पलाइन नंबर दिया जाए। जहां जरूरत पड़ने पर वे शिकायत कर सकें।

ये पेटिशन इसलिये है कि हम अपनी महिलाओं को सम्मानजनक स्थिति में ला सकें। उन्हें बराबरी का दर्जा दिला सकें। परिवार के भीतर होने वाले मानसिक-शारीरिक शोषण से उन्हें बचा सकें।



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