संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाए

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हमारे देश भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है परंतु इसकी एक राष्ट्रभाषा होना अत्यंत आवश्यक है जहां तक मैं समझता हूं कि राष्ट्रभाषा के रूप में संस्कृत सर्वश्रेष्ठ भाषा हो सकती है क्योंकि संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है यह समस्त भाषाओं की जननी मां है समस्त देशों के समस्त विद्वानों ने इसकी भूरी भूरी प्रशंसा की है प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक काल तक यह समस्त विश्व के लिए ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती आई है। विदेशों से अनेक विद्वान संस्कृत का अध्ययन करने के लिए कई सदियों पूर्व से हमारे भारत में आते रहे हैं और अपने देश में जाकर अपनी भाषा संस्कृति को समृद्ध करते आए हैं। इसी कारण से हमारा देश विश्व गुरु कहलाता है। कृषि पशुपालन पक्षी जंतु विज्ञान फसल उत्पादन शासन तंत्र न्याय व्यवस्था दिनचर्या आहार विज्ञान मौसम विज्ञान शरीर विज्ञान वस्त्र निर्माण अभियांत्रिकी पाक शास्त्र, व्यापार,विमान शास्त्र औषधि, पुरातत्व वास्तु मूर्तिकला चित्रकला, नृत्य कला, संगीत कला, स्थापत्य, खगोल ग्रह विज्ञान, चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, आयुर्वेद, रसायन भौतिकी राष्ट्रभक्ति समाज व्यवस्था धर्म संस्कृति राजनीति अर्थशास्त्र आदि अनेक विषयों से समृद्ध अमूल्य ग्रंथ हमारे विश्व की विरासत है जिनके अनुशीलन में अनेक महापुरुष उत्पन्न हुए हैं,, संस्कृत की कुछ विशेषताएं यहां विचारणीय है-

(१) संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।

(२) इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।

(३) सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।
(४) इसे देवभाषा माना जाता है।
(५) संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है।
संस्कृत > सम् + सुट् + 'कृ करणे' + क्त, ('सम्पर्युपेभ्यः करोतौ भूषणे' इस सूत्र से 'भूषण' अर्थ में 'सुट्' या सकार का आगम/ 'भूते' इस सूत्र से भूतकाल(past) को द्योतित करने के लिए संज्ञा अर्थ में क्त-प्रत्यय /कृ-धातु 'करणे' या 'Doing' अर्थ में) अर्थात् विभूूूूषित, समलंकृत(well-decorated) या संस्कारयुक्त (well-cutured)।
संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।
(६) शब्द-रूप - विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं।
(७) द्विवचन - सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।
(८) सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जा है ।
(९) इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।
(१०) शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।
(११) संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।
(१२) संस्कृत विश्व की सर्वाधिक 'पूर्ण' (perfect) एवं तर्कसम्मत भाषा है।
(१३) संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।
(१४) संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है। दीर्घ कालखण्ड के बाद भी असंख्य प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं (वैदेशिक आक्रमणों) को झेलते हुए आज भी ३ करोड़ से अधिक संस्कृत पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। यह संख्या ग्रीक और लैटिन की पाण्डुलिपियों की सम्मिलित संख्या से भी १०० गुना अधिक है। निःसंदेह ही यह सम्पदा छापाखाने के आविष्कार के पहले किसी भी संस्कृति द्वारा सृजित सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।
(१५) संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।

भारत एवं विश्व के लिए संस्कृत का महत्त्व-
संस्कृत कई भारतीय भाषाओं की जननी है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। यदि इच्छा-शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की भाँति पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है। हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं। हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है। हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत पर आधारित होते हैं। भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है। भारतीय संविधान की धारा 343, धारा 348 (2) तथा 351 का सारांश यह है कि देवनागरी लिपि में लिखी और मूलत: संस्कृत से अपनी पारिभाषिक शब्दावली को लेने वाली हिन्दी राजभाषा है। संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है। संस्कृत का साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा मिलेगा। संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये (कृत्रिम बुद्धि के लिये) सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।
 
संस्कृत का अन्य भाषाओं पर प्रभाव-
संस्कृत भाषा के शब्द मूलत रूप से सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं में हैं। सभी भारतीय भाषाओं में एकता की रक्षा संस्कृत के माध्यम से ही हो सकती है। मलयालम, कन्नड और तेलुगु आदि दक्षिणात्य भाषाएं संस्कृत से बहुत प्रभावित हैं। यहां कुछ शब्द दिए गए हैं जो संस्कृत भाषा से प्रभावित है-

मातृ
माता
अम्मा
मातेर
मदर्
मुटेर
मादर


पितृ/पितर
पिता
अच्चन्
पातेर
फ़ाथर्
फ़ाटेर
 
दुहितृ
बेटी
दाह्तर्
 
 
भ्रातृ/भ्रातर
भाई
ब्रदर्
ब्रुडेर
 
पत्तनम्
पत्तन
पट्टणम्
टाउन
 
वैधुर्यम्
विधुर
वैडूर्यम्
वैडूर्यम्
विजोवर्


सप्तन्

सात

सेप्तम्

सेव्हेन्
ज़ीबेन
 
अष्टौ
आठ
होक्तो
ओक्तो
ऐय्‌ट्
आख़्ट
 
नवन्
नौ
हेणेअ
नोवेम्
नायन्
नोएन
 
द्वारम्
द्वार
दोर्
टोर
 
नालिकेरः
नारियल
नाळिकेरम्
कोकोस्नुस्स
 
सम
समान 
same
 
 
तात=पिता 
Dad
 
 
अहम् 
I am
 
 
स्मार्त
Smart

इन सबसे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत विश्वभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में सर्वथा उपयुक्त है इसलिए मैं आप सभी के माध्यम से हमारे देश के माननीय राष्ट्रपति महोदय एवं माननीय प्रधानमंत्री महोदय से प्रार्थना करता हूं कि वह संस्कृत को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता प्रदान करें, भूरिश: धन्यवाद।