याचिका बंद हो गई

आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव

यह मुद्दा 8 हस्ताक्षर जुट गये


आरक्षण किसलिए शुरू हुआ? आरक्षण के पीछे संविधान निर्माताओं की मूल भावना क्या थी? क्या यह उन लोगों के लिए है जो सत्ता की, प्रशासन की मुख्य धारा में हैं, जो नीतिनिर्माता हैं? क्या यह उन लोगों के लिए है जो करोडपति-अरबपति हैं? क्या यह उन लोगों के लिए है, जिनके पास सुख-सुविधा, ऐशोआराम और बच्चों की परवरिश-शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए भरपूर संसाधन हैं, जिनकी हुकूमत चलती है? जो लोग न केवल मुख्यधारा में हैं, बल्कि मुख्यधारा का नेतृत्व करते हैं. यदि नहीं तो ऐसे मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, प्रशासनिक अधिकारियों को आरक्षण का लाभ क्यों?

अभी भी आरक्षित जातियों में जो दबे-कुचले लोग हैं, उन्हीं को आरक्षण मिलना चाहिए न? उन्हीं की जातियों के बडे लोग उन तक तो कोई लाभ पहुंचने ही नहीं देते ! अब यहां अगडी जातियां कहां दोषी है? फिर क्या अगडी जातियों के साथ आप अन्याय नहीं कर रहे हैं? जनरल की सीटें आप आरक्षित वर्ग से कैसे भर रहे हैं?

जिस प्रकार भ्रष्टाचार देश को दीमक की तरह चाटकर खोखला कर रहा है, उसी प्रकार आरक्षण रूपी नरभक्षी राक्षस न केवल देश की प्रतिभाओं को निगल रहा है, बल्कि देश को, हमारे सामाजिक जीवन को, लोगों के स्वास्थ्य और विकास को भी बर्बाद कर रहा है। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की आरक्षण की नीति अपने असली मकसद से भटक गई है।

उनका मकसद था- दमित, दलित और समाज से कटे हुए लोगों को समाज की मुख्य धारा में लाना; लेकिन हो क्या रहा है? एससी, एसटी या ओबीसी कोटे से आज जो एक मंत्री, सांसद या विधायक अथवा आईएएस, आईपीएस या अन्य प्रशासनिक सेवा में उच्चाधिकारी बन गया है, डॉक्टर या इंजीनियर बन गया है अथवा जिसने सरकार में स्थाई नौकरी प्राप्त कर ली है, क्या वो तब भी समाज की मुख्य धारा से कटा हुआ है? उसे दुबारा आरक्षण क्यों, उसके बच्चों को आरक्षण क्यों और कब तक? क्या यही वह वर्ग नहीं है जो अपने ही भाईयों को आगे नहीं बढने देकर उनका हक खा रहा है और आजादी के सात दशक बाद अब यह सम्पूर्ण समाज के लिए नासूर बनता जा रहा है? क्यों नहीं आरक्षण का लाभ सिर्फ उन्हें मिले जो आरक्षित वर्ग में ही अब तक इससे वंचित हैं?

एक छोटा सा गंभीर उदाहरण राजस्थान का देता हूं। यहां जनजाति के आरक्षण का लगभग सम्पूर्ण लाभ जयपुर, कोटा, सवाईमाधोपुर, करोली, अलवर, भरतपुर आदि क्षेत्रों में रहने वाले मीना जाति के जागीरदार, जिस समुदाय में उच्च शिक्षा है, जहां के अधिकांश परिवारों में कोई न कोई व्यक्ति भारतीय प्रशासनिक सेवा, राजस्थान प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा व अन्य सरकारी सेवाओं में या फौज में मिलेगा, जिनके पास बडी-बडी लेंड होल्डिंग है, काफी सम्पन्न व समृद्ध हैं, वे लोग ले रहे हैं। जबकि असल आदिवासी जनजाति के लोग जो जनजाति उपयोजना क्षेत्र में रहते हैं, उनके सामने दो समय की रोटी का भी संकट है और भुखमरी के हालात हैं। जहां आधे से ज्यादा गांवों में बिजली नहीं है, शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है। शिक्षा-चिकित्सा और रोजगार की दृष्टि से सबसे ज्यादा वंचित वर्ग है। आप स्वयं फैसला करें कि आरक्षण का लाभ उन भील-गमेती-मीणा समुदाय के लोगों को मिलना चाहिए या जागीरदारों और बडे-बडे प्रशासनिक अधिकारियों को मिलना चाहिए...?



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