भारत के जातीय संगठन बन्द करे सरकार

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�जातीय संगठन और सामाजिक जनतंत्र�

✍️आज हर जातीय के पास जातीय संगठन है | अब किसी भी जाति के लोगो के पास यह कहने का मुँह- माथा नही रह गया है की फला जाति के लोग जातिवादी है |जातिवादी संगठन बना रहे है |
कयोंकि जातिवादी संगठनों के जरिये जातिवाद करने - बढाने और समाज को बाटने का काम किसी भी जाति के लिए बाकी नही रह गया है |

�जातियां पैतृक पेशे, व्यवसाय, कार्य से बनी थी लेकिन वर्तमान दौर में बनते जातीय संगठन में इस काम के लिए तो कोई जगह ही नही है | वह काम तो उनके एजेण्डे में ही नही है | चाहे वह कोई भी जाति क्यों ना हो | कोई व्यवसाय की बात नही करता

�इससे भी साबित होता है कि वर्तमान दौर में जातीय संगठनों के बनने का मुख्य कारण एकदम दुसरा है | उसके जरिये जातियों के आगे बढ़े हुए लोग , जाति के नाम पर जातीय विकास व कल्याण के नाम पर समूची जाति को अपने पीछे लगा लेते है | जातीय संगठनों के नेता बनकर भाषण -प्रशासन से लेकर राजनीत में अपना असर - रसूख बना व बढा लेते है | फिर उससे अपने स्वार्थो की पूर्ति करते रहते है | एवं राजनैतिक पार्टियों से चुनावी टिकट दिलाने का लालच दे कर लाखों रुपए की वसूली भी कर लेते है।
ये जाती के रक्षक नही बल्कि समाज के भकक्षक है।

�इसे बढावा देने का प्रमुख काम देश की हुकूमत द्वारा पिछले 30 सालो से धर्मवादी , सम्प्रदायवादी , जातिवादी तथा इलाकावादी चुनावी राजनीत के जरिये किया जाता रहा है | धर्म , सम्प्रदाय व जाति की राजनितिक पार्टियों एवं प्रचार माध्यमो द्वारा उसे पनपाया व बढाया जाता रहा है | आम लोगो के हितो को उनके धार्मिक व जातीय समूहों के हितो के नाम से प्रस्तुत व प्रचारित किया जाता रहा है | धर्म , सम्प्रदाय व जाति के सत्ता - स्वार्थी इस्तेमाल की इसी राजनीत ने हर जाति के उच्च व बेहतर स्थितियों के लोगो में , अपनी जाति के लोगो के समर्थन का इस्तेमाल कर उपर चढने , राजनेता बनने की भूख जगा दी है | यही भूख उनसे जातियों के कल्याण - उत्थान का नाम लेकर जातीय संगठन बनवा रही है

देवल कुमार