छोटे हथियारों को लाइसेंस मुक्त किया जाय

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आतंकवाद हो या दंगे, हथियारों की बड़ी भूमिका है। यह सत्य है कि, सेना से सेना और सरकार से सरकार ही लड़ सकती है। उसी प्रकार यह भी सत्य है कि, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित जनसमूह से लड़ने के लिए, अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित जनसमूह जो ज्यादा सबल हो की ही आवश्यकता पड़ेगी। यही प्रकृति का नियम है।

हम जानते हैं लेकिन कहने से घबराते हैं कि, भारत के हर गाँव हर शहर में "स्लीपर सेल" तैयार हो चुके हैं और एक निर्णायक युद्ध की तयारी लगभग पूरी हो चुकी है।

यह एक ग़लतफ़हमी है कि, केवल सुरक्षा बल ही ब्लड-कैंसर की तरह फ़ैल चुके स्लीपर सेल का मुकाबला कर लेंगे, क्योंकि सुरक्षाबलों को व्यस्त रखने के लिए आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय तैयारियां हैं।

तमाम सुरक्षाबलों के होते हुए भी गांव के गाँव पलायन करते रहे हैं। इतिहास गवाह है।

अतः जनसमूह को शस्त्र-सज्जित करना एकमात्र उपाय है और यह काम बहुत ही आसानी से किया जा सकता है। बस छोटे हथियारों, जिनके बैरेल की अधिकतम लंबाई और बोर निर्धारित हो, को बनाने, बेचने और रखने को कर तथा लाइसेंस मुक्त कर दिया जाय। गुणवत्ता नियंत्रण के उपाय किये जा सकते हैं।

इससे होगा यह कि आम जनता भी सस्ते दर पर हथियार खरीद सकेगी। अपराधी तत्व तो तमाम कानूनों के बाद भी हथियार से लैस है ही, लेकिन आमजन कानून के भय से शस्त्र नहीं खरीद पाती।

यह हमारी संस्कृति है कि, हमारा जन शास्त्र और शस्त्र से सुसज्जित रहे। इससे दूर होने की वजह से ही हम कमजोर और परतंत्र हुए।



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