नागरिकता {संसोधन} कानून

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मैं रोज-रोज पेटिशन बनाता नहीं, साइन भी नहीं करता। लेकिन संसद द्वारा पास किया गया नागरिकता (संशोधन) कानून कोई साधारण कानून नहीं है। यह कानून भारत की आत्मा पर हमला है। इतनी बड़ी बात मैं हल्के में नहीं कहता। यह कानून पहली बार भारत की नागरिकता को धर्म से जोड़ता है। पहली बार मुसलमान और गैर-मुसलमान में कानूनी भेदभाव करता है।

बचपन से "हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, हम सब हैं आपस में भाई-भाई” के जो बोल सुनकर हम बड़े हुए, उसमें से एक नाम को अलग-थलग कर दिया जाएगा। जरा सोचिये, जिस सरकार को जनता ने चुना, वही पलटकर उसी जनता से कह रही है कि साबित करो कि तुम भारतीय हो। यूँ भी, हम अपनी पहचान साबित कर के क्या करेंगे, अगर हमारे देश की पहचान ही नहीं बचेगी। आज खतरा इतना बड़ा है। आज अगर खामोश रहे तो कल कुछ बचाने को बचेगा ही नहीं।

इसलिए आप इस पेटीशन को साइन करें, ज्यादा से ज्यादा शेयर करें तथा साझी विरासत, साझी शहादत और साझी नागरिकता को बचाने में अपना योगदान दें।

नागरिकता संशोधन कानून क्या है?

"नागरिकता (संशोधन) विधेयक" (जिसे CAB कहा जाता है) 12 दिसंबर से लागू हो गया है। इसके मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से जो लोग गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुसे या बसे हुए हैं, उनमें से मुसलमानों को छोड़कर बाकी सबको भारत की नागरिकता दी जा सकेगी। मुसलमानों के अलावा सबको बिना किसी कागज़ के भारत का नागरिक मान लिया जायेगा। यानी पहली बार कानून बनाकर देश की नागरिकता को मजहब/धर्म से जोड़ दिया गया है। पहली बार भारत में मुस्लिम और गैर-मुस्लिम के बीच एक कानूनी लाइन खींच दी गई है। 

यही नहीं, सरकार ने यह घोषणा भी की है कि देश भर में असम की तरह नये सिरे से नागरिकों की गिनती कर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ( इसे NRC कहते हैं)  बनेगा। इस रजिस्टर में नाम लिखाने के लिए सिर्फ राशन कार्ड या आधार कार्ड होने या वोटर लिस्ट में नाम होने से काम नहीं चलेगा। हर मर्द-औरत, बच्चे-बूढ़े को अपने भारत का नागरिक होने का सबूत देने पड़ेगा। 

असम की तरह देश भर में अफरा-तफरी मचेगी, हर व्यक्ति को जन्म, शादी या पते का कानूनी सबूत जुटाना पड़ेगा, टाइम और पैसा खर्च होगा। अगर दस्तावेज में कमी रह गयी तो विदेशी घोषित होने का डर होगा। मुसलमान हुआ तो एकदम वोटर लिस्ट से नाम कट जायेगा, फिर गिरफ्तारी और विदेशियों के कैंप में बंद होने का खतरा। जो मुसलमान नहीं हैं उन्हें छूट मिल सकती है, लेकिन तभी अगर उनका परिवार पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश से आया है। यानी नेपाल से आये गोरखा और हिन्दुओं को भी विदेशी माना जायेगा। 

सरकार ने यह कानून क्यों बनाया?

सरकार कहती है कि यह कानून हमारे पड़ोसी देशों में भेदभाव के शिकार होने वाले लोगों को शरण देने के लिए है। अगर ऐसा होता तो बहुत अच्छी बात थी। लेकिन इस कानून की किसी भी धारा में ’भेदभाव’ और ’धार्मिक अल्पसंख्यकों’ का जिक्र तक नहीं है, सिर्फ उन धर्मों की लिस्ट दी गयी है जिन्हे छूट मिलेगी। शरणागत का धर्म पूछना तो सबसे बड़ा अधर्म है।

सरकार की दलील का झूठ इन सवालों से साफ़ हो जाता है:

अगर पड़ोसी देशों के पीड़ित लोगों को शरण देनी थी तो चीन, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार पर इसे लागू क्यों नहीं किया गया? अगर भेदभाव के शिकार लोगों की मदद करनी थी तो पाकितान के बलूचिस्तान, नेपाल की तराई, बांग्लादेश से आये बिहारी और श्रीलंका के तमिल लोगों को शरण क्यों नहीं दे रहे?

अगर धार्मिक आधार पर भेदभाव के शिकार को बचाना था तो तिब्बत के बुद्धधर्मी, चीन के उईगर मुसलमान, बर्मा के रोहिंगिया और श्रीलंका के गैर-बौद्ध लोगों को यही छूट क्यों नहीं? अगर सिर्फ इन तीन देशों में धार्मिक भेदभाव की चिंता बात थी, तब भी पाकिस्तान में मुसलमानों के भीतर शिया और अहमदिया संप्रदाय और अफगानिस्तान में हज़ारा समुदाय को शामिल क्यों नहीं किया गया?

बात साफ है। सरकार का इरादा किसी अल्पसंख्यक या भेदभाव के शिकार की मदद करना नहीं है। ये तो बहाना है। असली जरुरत तो असम के बंगाली हिन्दुओं को विदेशी घोषित होने से बचाना है, जो बीजेपी के वोट बैंक हैं। असली खेल तो पश्चिम बंगाल के आने वाले चुनाव से पहले हिन्दू-मुसलमान को दोफाड़ करना है। असली निशाना तो किसी न किसी तरह मुसलमान को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनाना है, उसे अपने ही घर में किरायेदार की हैसियत दिलाना है। 

आपको इसका विरोध क्यों करना चाहिए? 

ये कानून भारत के संविधान में दिए समानता के अधिकार के खिलाफ है। आज मुसलमान का नंबर है तो कल किसी और की बारी आएगी। ये कानून राम प्रसाद बिसमिल और अशफ़ाकुल्लाह खान के भारत को शर्मसार करता है। मुसलमान और गैर-मुसलमान में भेदभाव करता है। संविधान की रक्षा के लिए इसका विरोध करिए।

देश की आज़ादी में हर धर्म के लोगों ने अपना खून दिया था। अब देश की नागरिकता को धर्म से जोड़ने का मतलब है कि हम उन शहीदों का भी अपमान कर रहे हैं। शहादत का अपमान रोकने के लिए इसका विरोध करिए। अलग-अलग धर्म-पंथ को मानने वालों को अलग-अलग देश का नागरिक होना चाहिए यह जिन्ना का विचार था, हमारा देश तो इस विचार को खारिज करके बना है। ये जिन्ना और सावरकर नहीं, गांधी-अंबेडकर का भारत है, पटेल और आजाद का भारत है। इसलिए इसका विरोध करिए।

यह कानून असम की जनता के साथ 1985 में किये समझौते का उल्लंघन है, पूर्वोत्तर के प्रदेशों की भावनाओं की अनदेखी है। पूर्वोत्तर के भाई-बहनों की खातिर इसका विरोध करिए।

नोटबंदी की तरह बैठे-बैठाए मुसीबत मोल लेने से देश का ही नुकसान होगा। नागरिकता के रजिस्टर के लिए सबूत जुटाने में करोड़ों हिन्दू-मुसलमान-सिख-ईसाई-बौद्ध सब लोग परेशान होंगे, लाइनों में लगेंगे, गरीबों पर आफत आएगी। नोटबंदी की तरह देश को कुछ हासिल नहीं होगा। इसलिए इसका विरोध करिए।

अगर सारा देश नागरिक-विदेशी, हिन्दू-मुसलमान के चक्कर में फंसा रहा तो देश की असली समस्याओं से ध्यान बंट जायेगा। अर्थव्यवस्था में मंदी है, बेरोजगारी चरम सीमा पर है, खेती-किसानी बरबाद हो रही है, मंहगाई बढ़ रही है। सरकार को झूठी बीमारी की दवा पिलाने की बजाय असली बीमारी का इलाज करना चाहिए। सरकार सो रही है, उसकी आँख खोलने के लिए इसका विरोध करिए।

हम क्या चाहते हैं?

इस पेटिशन के जरिये हम मांग करते हैं:

1. भारत की संसद से, कि वह नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 पर पुनर्विचार कर उसे वापिस अपने मूल स्वरूप में रहने दे।

2. भारत के सर्वोच्च न्यायलय से, कि वह इस असंवैधानिक कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तुरंत सुनवाई करे और संविधान की रक्षा करे।

3. भारत के सभी नागरिकों से, कि वे स्वाधीनता आंदोलन और संविधान की आत्मा की रक्षा के लिए इस कानून का अहिंसक और लोकतान्त्रिक तरीके से विरोध करें।