बैंकों में जमा आम जनता के पैसों की गारंटी

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दिन प्रतिदिन कोई न कोई बैंक या बैंकिग संस्थान फर्जीवाड़ा का शिकार हो रहा है। ऐसे में हम आम लोगों को बहुत डर सताता रहता है कि कहीं कल सुबह या परसों शाम तक हमारे खाते वाली बैंक भी कुछ घपले-घोटालों न कर दे और कहीं ऐसा कुछ हुआ तो हम गरीब साधारण लोग तो सड़क पर आ जायेंगे। हमारी तो रोटी तक छिन जाने का भय रहता है।

ज्यादातर जनता यही जानती है कि बैंक में रखा उसकी गाढी कमाई का पैसा सुरक्षित है और जरूरत पड़ने पर गाढे समय में उसका सहारा बनेगा। 

अपने पेट काटकर, अपनी खुशियों से समझौता कर आम आदमी एक एक पैसा जमा करता है ताकि भविष्य में काम आ सके। ऐसे मेहनत की कमाई पर किसी गद्दार या बेईमान की वज़ह से हमारे पेट पर लात मार दी जाती है, ये कौन सा न्याय है?  

यदि हमारा पैसा सुरक्षित रहेगा तो बैंकों की मजबूती के साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। 

हम एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं। सरकार की संरचना और उसमें निहित शक्तियों का प्रथम तथा अन्तिम स्रोत जनता ही होती है। हम सरकार चुनते ही इसीलिए हैं ताकि सामाजिक, आर्थिक, सामरिक तथा अन्य दृष्टिकोण में हम स्वयं को सुरक्षित रख सकें। अर्थात् जनता स्वयं सुरक्षा, सुविधा तथा विवादों के निपटारे हेतु सरकार का गठन करती है। ऐसी सरकार का मतलब ही क्या जो जनता के अधिकारों की रक्षा न कर सके।

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर सरकार और उसके विभिन्न विभागों/ संगठनों से अपील करता हूँ कि बैंक में रखा जनता की मेहनतकश कमाई के एक एक पैसे को सुरक्षित रखने की दिशा में उपयुक्त प्रावधान किया जाए और कुछ भी गलत होने की स्थिति से निवारण के लिए कठोर कानून बनाया जाए हर्जाने की  राशि को ग्राहक के द्वारा जमा किये कुल पैसे के कम से कम 80% तक किया जाए, जोकि वर्तमान समय में केवल एक लाख रुपये है। मतलब यदि आपने एक लाख रुपये जमा किये हैं तो भी एक लाख और यदि पचीस लाख है तो भी एक ही लाख मिलेंगे । ये तो अन्धेर नगरी वाली बात है।