Justice For All

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    Petitioning Ministry of Education, indian, Youth, Pmo, Supreme Court of India

    भारत में जाति आधारित आरक्षण बंद हो

    भारत में पैदा हुए विवाद के मुद्दों में आरक्षण के मुद्दे को सबसे अधिक विवादित है।  इसके कारण भी है कई सारे, जैसे इसी मुद्दे पे कुछ पार्टियो का राजनीतिक भविष्य टिका है, तो कुछ नेताओ का भविष्य। आरक्षण का मुद्दा थोडा सा सर उठता नहीं है की सामाजिक विद्वेष फैलाना शुरु हो जाता है। इस पे बहुत लिखा गया है कि आरक्षण का आधार क्या होना चाहिए। सामाजिक या आर्थिक। या दोनों। आज से दो तीन दशक पहले आरक्षण का सामाजिक आधार उचित था क्योंकि उस समय सामाजिक विषमताएं ज्यादा थी। पर आज की स्थिति एकदम उल्टा है। आज सामाजिक विषमताएं कम आर्थिक विषमता ज्यादा है। अमीरी और गरीबी में कुछ ज्यादा ही अंतर हो गया है। आज हर तरफ से आरक्षण की मांग उठ रही है, कहीं मजहब के नाम पर तो कही से जाति के नाम पर। सरकारी आंकड़े के अनुसार देश में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो में 80% अनुसूचित जाति, पिछड़े और मुसलमान है। सोचने की जरुरत ये है की आरक्षण का लाभ मिलता किसे है, ये सब जानते है की आरक्षण का अधिकतर लाभ उसे मिलता है जिसे उसकी जरुरत नहीं है। देश में आरक्षण का आधार अभी भी सामाजिक ही है। तो क्या समाज की मुख्य धारा में आ गए लोगो को भी इसका लाभ मिलना चाहिए ? समाज के उस पिछड़े वर्ग के परिवार पे भी यह बात लागू होती है जो अब सामाजिक रूप से काफी आगे है और संपन्न है तो क्या उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? दूसरी बात और की आरक्षण का लाभ कहाँ कहाँ कहाँ मिलना चाहिए। किसी को मेडिकल या इंजीनियरिंग या किसी और कोर्स में दाखिले के समय आरक्षण मिलता है। तो क्या उसे उसी डिग्री के आधार पे नौकरी में भी आरक्षण देना उचित है। क्या यह हमारी शिक्षा व्यवस्था पे प्रश्न चिन्ह नहीं है कि हम पांच साल की उच्च शिक्षा के बाद भी उसे आरक्षण के लोभ से बहार नहीं निकाल पाए या फिर बिना आरक्षण के आगे बड़ने के लायक नहीं बना सके, तो फिर उस उच्चशिक्षा का क्या मतलब। जिन जातियों को पिछड़ा माना गया है उन्हें आर्थिक पिछड़ेपन के कारण ही इस वर्ग में रखा गया था । जिस प्रकार किसी बीमार प्राणी के स्वस्थ होने के बाद उसे दवा नहीं दी जाती उसी प्रकार कमजोर को सबल बनाने के लिए स्थाई रूप से आरक्षण की बैसाखी नहीं दी जा सकती । जिन्हें कमजोर माना गया उन्हें सक्षम बनाने के उपायों पे कभी ध्यान नहीं दिया गया बल्कि उन्हें बैसाखी के सहारे ही खड़े रहने के लिए तरह तरह के उपाए किये जाते रहे। इस से विषमता के नए आयाम का जन्म हुआ, जो जन्म के आधार पर बनी विषमता से भी अधिक सामाजिक विद्वेष का कारण बनता जा रहा है। इसलिए यह आवश्यक हो गया है की उसका पुनः निर्धारण हो । उचित तो यह होगा की पात्रता का मापदंड आर्थिक स्थिति को ही माना जाये, लेकन राजनीतिक स्वार्थ के चलते ऐसा मापदंड अपनाना फ़िलहाल संभव दिखाई नहीं दे रहा है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले सभी लोगो को आरक्षण का पात्र मान लेने से निरंतर फ़ैल रहा जातीय विद्वेष समाप्त हो जायेगा। आखिर आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोगो को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? इसके लिए राष्ट्रीय सहमति की आवश्यकता है कि हमे आर्थिक समानता चाहिए या सामाजिक लेकिन एक बात तो तय है की आर्थिक समानता आने से समाज के लोगो मे सामाजिक समानता का संतोष अपने आप आ जाता है। आखिर कोई भी समाज समानता के सिद्धांत को अपनाता है न की विषमता का। दुष्यंत कुमार की गज़ल याद आ रही है…“हो गई है पीर पर्वत- सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए।मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।"

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